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[ गो. प्र. चिन्तामणि वैयावत्य है । औषधि ग्रादि के अभाव में प्रति उपकार की अपेक्षा नहीं करके अपने नापने हाथों से मल मूत्र, खंकार तथा नाकादि के भीतरी मल को दूर करना यान पूर्वक उठाना, विठाना; परिवर्तन कराना आदि भी वैयावृत्ति है ।
अस्मिन्निविचिकित्सत्य वत्सलत्व सनाथता । यशोऽभ्युदयनिः श्रेयसुखाप्ति प्रमुखा गुणाः ।।८७०३.
वैयावृत्ति करने वाले मानव को निर्विचिकित्सता, वात्सल्यत्व सनाथता, यणोभ्युदय, निश्रेय: मुगुख की प्राप्ति आदि अनेक मुरगों की प्राप्ति होती है। अर्थात् वैयावृति करने बाले में निर्जुगुप्सा गुण होता है, क्योंकि निर्जु गुप्सा के बिना बैमावृत्ति नहीं होती है । वात्सल्य भाव प्रगट होता है । वात्सल्य के अभाव में वैयावृत्ति कर नहीं सकते तथा वैयावृत्ति कारक पवित्र यश संसार में फैलता है और यानि का फल स्वर्ग सम्पदा एवं मूक्ति पद प्राप्त होता है ।
स्वाध्याय तप का लक्षणस्वस्मयोऽसौ हितोऽध्ययः स्वाध्यायो वाचनादिकः । तपोवर्यमतो नान्यत्तषः सु द्वादशस्वपि ॥८७१॥
जो प्रात्मीय हितकारी शास्त्र वाचनादिक अध्ययन है, वह स्वाध्याय है । और . बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान दूसरा कोई तप नहीं है ।
नोवमन्त महतात्सद्ध्यानमध्ययनं पुनः । सदैनो निर्जराकारि किन्तु न स्यात्कृतात्मनाम् ।।८७२।।
ध्यान अन्त मुंह से अधिक नहीं हो सकता है, परन्तु स्वाध्याय तो निरन्तर .. कर सकते हैं । जो पुण्यात्माओं के पाप की निर्जरा का कारण भूत है।
मनः सदर्थ वापाठेवणेऽक्षणी तच्छुतो अती। प्रसक्ते किष्कियेऽक्षेऽन्ये तदेकानय मिहाप्यलम् ॥८७३।।
स्वाध्याय परम ध्यान है, क्योंकि स्वाध्याय करते समय मन समीचीन अर्थ के विचार करने में लग जाता है, वचन पाठ करने में नेत्र वणों को देखने में और कर्मा शब्दों के सुनने में लीन हो जाते हैं. तथा सर्व इन्द्रियां निष्क्रिय हो जाती है, इसलिये स्वाध्याय में पूर्ण एकाग्रता होती है, अतः पत्र स्वाध्याय परम तप है। ..अस्मात्तत्त्वपराभ्यास: प्रशमश्च विरागता ।
प्रभावनैकांत वादिमान प्रमर्दनं ।।७४।।
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