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अध्याय पांचवां
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स्वाध्याय से तत्त्वों का अभ्यास होता है, प्रशम भाव वैराग्य की उत्पत्ति होती, स्वाध्याय के बल से एकांत वादियों के मान के मर्दन करने की शक्ति प्राप्त होती है तथा धर्म की प्रभावना भी होती है ।
व्युत्सर्ग का लक्षण --
शरीरान्तर्बहिः संग संग व्युत्सर्जनं मुनेः । व्युत्सर्गः स्यात्समीचीन ध्यान संसिद्धि कारणम् ||८७५ ॥ अंतरंग और बहिरंग के भेद से परिग्रह दो प्रकार का है। उनमें अंतरंग शरीर का ममत्व कोवादि कषायों का त्याग करना अभ्यन्तर व्युत्सर्ग है और क्षेत्र, वस्तु आदि बहिरंग परिग्रह का त्याग करना बहिरंग ब्युत्सगं मुनियों के ध्यान को सिद्धि का कारण है।
ध्यान तप का लक्षण
परं चित्तैकार्थलीन प्रवर्त्तनं ।
ध्यानं तपः कीर्त्यते हविस्तं मतं मोक्ष प्रधनं ८७६॥
अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त अवस्थान जिसका ऐसा चित्त का एकार्थ में लीन होकर प्रवर्त्त होना स्वर्ग मोक्ष का सावन ध्यान नामक सर्वोत्कृष्ट तप कहा जाता हूँ । विशिष्ट मिष्टं घत्युदारं दूरस्थितं वस्त्वति दुर्लभं च ।
जैनं तपः कि बहुनोदितेन स्वर्गश्रियं चाक्षय मोक्ष लक्ष्मी ॥७७॥
जैन तप के प्रभाव से प्रति दूरस्थ प्रति दुर्लभ, इष्ट विशिष्ट वस्तु की प्राप्त होती | और तो क्या स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति भी जिनेन्द्र भगवान के द्वारा कथित तप के प्रभाव से होती है ।
दशलक्षण धर्म
( उत्तम क्षमा मार्दवाजेव शौच सत्य संयम तप त्यागाकिञ्चन्या च र्याणिधर्मः । सर्वार्थसिद्धि, प्र० ६ पेज नं. ४१२ पूज्यपादाचार्य कृत )
उत्तम अमा, मार्दव, ग्रार्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, ग्राकिञ्चन्य, ब्रह्म, यह दश प्रकार धर्म है । अब इन धर्मों का स्वरूप अलग-अलग कहते हैं । उत्तम क्षमा-शरीर की स्थिति के कारण की खोज करने के लिये, वह
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