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________________ ३७६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि विहार श्रादिक में ग्रामादिक को जाते समय साधु को दुष्ट जन गाली गलौच करते हैं। उपहास करते हैं, तिरस्कार करते हैं, मारते पीटते हैं और शरीर को तोड़ते मरोड़ते हैं, तो भी उनके मन में किसी प्रकार की कलुषता उत्पन्न नहीं होती, कभी क्षुभित नहीं होते हैं, शांत चित रहते हैं, नाना प्रकार के कारण मिलने पर भी क्रोध नहीं करते, इसी का नाम उत्तम क्षमा है । उत्तम मार्दव-जाति यदि आठ प्रकार के मदों के प्रवेशवेश होने वाले अभिमान का अभाव करना मार्दव है, मार्दव का अर्थ है मान का नाश करना । उत्तम आर्जव -- योगों का वक्र न होना ग्रार्जव है । यार्जव गुण का वारी मन से एक, वचन से एक, काय से एक रहता है । उत्तम शौच --- प्रकर्ष प्राप्त लोभ का त्याग करना, उत्तम शौच है । अनन्तानु बन्धी लोभ का कम करना । उत्तम सत्य —च्छे पुरुषों के साथ साधु वचन बोलना सत्य है । उत्तम संयम — समितियों में प्रवृत्ति करने वाले मुनि के उनका परिपालन करने के लिये जो प्राणियों का और इन्द्रियों का परिहार होता है, वह संयम है । उत्तम तप-- कर्मक्षय के लिये जो तप तपा जाता है, उसे तप कहते हैं । वह् तप बारह प्रकार का है, सो पीछे उसका बन कर आये हैं । उत्तम त्याग - जो संयमी के योग्य उपकरणों का दान करना त्याग है। वह दान चार प्रकार का है, सो वर्णन पीछे कर आये हैं । उत्तम प्राकिञ्चन्य - जो शरीरादिक उपात्त हैं, उनमें भी संस्कार का त्याग करने के लिये 'यह मेरा है' इस प्रकार के अभिप्राय का त्याग करना थाकिञ्चन्यं I इसका कुछ नहीं है, वह आकिञ्चन है, और उसका भाव या कर्म. याकिञ्चन्य है । उत्तम ब्रह्मचर्य --- अनुभूत स्त्री का स्मरगा न करने से, स्त्री विषयक कथा के सुनने का त्याग करने से और स्त्री से सटकर सोने व बैटने का त्याग करने से परिपूर्ण ब्रह्मचर्य होता है । प्रथवा स्वतन्त्र वृत्ति का त्याग करने के लिए गुरुकुल में निवास करना ब्रह्मचर्य है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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