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अध्याय : पांचवां
पंचाचार दर्शन--सम्यग्दर्शन अर्थात् तस्वों में रूचि रखना, ज्ञान---जीवादि तत्वों के म्वरूप को जानना, चारित्र---पापक्रियानों से विरक्त होना, तप-कर्म को दग्ध करने में समर्थ और शरीर तथा इन्द्रियों को संतप्त करने वाला बाह्य और प्राभ्यंतर भेद जिसके हैं। चोय---शक्ति, अस्थि और शरीर का सामाई, एनत्स्वरूपी बोर्य अथवा इनका जो अनुष्ठान, उसको प्राचार कहते हैं ।
१. दर्शनाचार---जीवादि पदार्थों पर निःशंकितादि अंगों सहित श्रद्धान करना, अर्थात् जिससे सम्यग्दर्शन पहिचाना जायेगा, ऐसी क्रियायें करना, दर्शनाचार है । यहां दर्शन शब्द का अर्थ अवलोकन नहीं है क्योंकि जीवादि तत्त्वों पर श्रद्धान . करना, यह प्रकरण यहां है।
२. ज्ञानाचार-~-पांच प्रकार की ज्ञानोत्पत्ति का कारण ऐसे शास्त्र का अध्ययन करना, उसका आदर करना, इत्यादि क्रिया ज्ञानाचार है।
३. चारित्राचार--प्राणि यध नहीं करना तथा इंद्रिय वश करने में प्रवृत्त । होना चारित्राचार है।
४. तपाचार--काय क्लेशदिक करना तपाचार है। ५. वीर्याचार---शुभ कार्यों में सामर्थ्य रखना, उत्साह रखना।
इस प्रकार के पंचाचारों का वर्णन किया, पड् आवश्यकों का वर्णन पहले कर आये हैं, अब गुप्तियों का वर्णन करते हैं।
गप्ति मण वच काय पत्ती भिक्खू सावज्ज, कज्ज, संजुत्ता। रियप्पं रिणवारयंतो तोहिंदुः गुत्तो हददि एसो. ॥८७
. हिंसादि पाप कार्यों से मन की प्रवृत्ति, वचन का व्यापार और काय की . . व्यापारादि की चेष्टा को निवारण करने वाला साधु कम से, मनोगुन्ति युक्त, बचन सुप्ति युक्त और कासगुप्ति युक्त होता है। मनोगुप्ति और बचन गुप्ति का विशेष लक्षरण-~
जा रायादिरिणवत्ती भरपस्स जारवाहि तं मरणोगुत्ती । अलियादिरिणयत्ति वा मोरणं वा होदि वचिगुत्ती ॥८७६॥
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