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Sractisthesiasai
[ गो. प्र. चिन्तामणि रागद्वेप से उत्पन्न होने वाल सर्व संकल्पों का त्याग करने से मनोगन्ति . होती है, और असत्य भाषण, कटोर भापग, असभ्य भाषण प्रादि कुवचनों का त्याग करना अथवा मीनधारण करना वचनगुन्ति का लक्षशा है । तात्पर्य-राग द्वेष पूर्वक होने वाले संकल्पों का त्याग करके मन को समता में रखना, अथवा धर्म ध्यान और शुबल ध्यान में स्थिर रखना मनोगुपित है । इशारा करके बचनाभित्राय व्यक्त करने से बचनगुप्ति नहीं होती है। अतः इशारों का त्याग करके कठोर वचनादिका का त्याग करना वचनगुप्ति है। साथबा मौन धारण करना बद्धन गुप्ति है, इस प्रकार . मनोगुप्ति का विवेचन किया है। . . कायगुप्ति का स्वरूप-~
कायकिरियाणियत्ती कामोसगो सरीर गुत्तीहि ।
हिसादिगियत्ती वा सरीरगुत्ती हवदि दिट्ठा ।।८८०॥ ........ शरीर की शादी करना मात्रा कायोत्सर्ग करना, किंवा हिंसा, चोरी,
मैथुन सेवनादि पागों का त्याग करना, शरीराप्ति है। गुप्ति का लक्षणा आचार्य ऐसा कहते हैं, सम्यग्दर्शन झान चारित्राणि गुप्यन्ते, रक्ष्यन्ते यकाभिस्ता गुप्तयः अथवा 'मिथ्यात्वा संयम कषायेभ्यो गोप्यते रक्ष्यते श्रात्मा यकाभिस्ता गुप्तवः' सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यरचारित्र रूपी रत्नत्रय का गोपन' अर्थात् रक्षण जिनके द्वारा किया जाता है, उनको गुप्ति कहना चाहिये । अथवा जो मिथ्यात्व, अभंवम और कपायों से प्रात्मा का रक्षणा करती है, उनको गुप्ति कहते हैं। इस प्रकार प्राचार्य परमेष्टि के छतिस मल गुन्गों का वर्णन किया, पागे उपाध्याय परमेष्टि के भूल गुणों का वर्गान करते हैं।
उपाध्याय परमेष्ठी रयरगत्तय संजुत्ता जिण कहिय पयत्भदेसया सूरा । णिक्करव भान सहिया उवाया एरिसा होति ।।८८१३
- (नियमसार, प्राचार्य कुन्दकुन्द) रत्नत्रय से. संयुक्त, जिनेंद्र देव द्वारा कथित पदार्थों का उपदेश देने वाले, शूर और नि:क्षित भाव से सहित ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी होते हैं 1 और द्वादशांग के पाठी और शिष्यों को (मुनियों) पढ़ाने वाले होते हैं। समस्त श्रुतज्ञान के पाठी.