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________________ अध्याय : पांचवां ] श्रुत ज्ञान १. पर्याय २. पर्याय समास, 5. ग्रक्षर, ४. ग्रक्षर भमास ५. पद ६. पदसमास, ७ संचात संघात समास, 2. प्रतिपत्ति १०. प्रतिपत्ति समास, ११. अनुयोग, १२. अनुयोग समास १३. प्राभृत-प्राभृत, १४. प्राभृत-प्राभुत समास, १५. प्राभृतक १६ प्राभृतक समास १७. वस्तु १८. वस्तु समास १६. पूर्व २०. पूर्व समास, ये सब २० भेदाङ्ग के अन्तर्गत ही होते हैं, अब इनका अलंग-ग्रलग खुलासा लिखते हैं । १. पर्याय श्रुतज्ञान सूक्ष्म नित्यनिगोद के लब्ध्यपर्याप्तक जीव के पहले समय में जो श्रुतज्ञान होता है, उसकी पर्याय तज्ञान कहते हैं । यह ज्ञान सबसे जघन्य होता है 'लब्ध्यक्षर' इसका नाम है | श्रुतज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम को 'लब्धि' कहते हैं । और जिस ज्ञान का कभी नाश न हो उसकी 'क्ष' कहते हैं । यह ज्ञान सदा बना रहता है, इसका कभी अवरस्य नहीं होता । यह ज्ञान एक क्षर का अनंतवां भाग होता है। इसीलिए यह ज्ञान सबसे जघन्य कहा जाता है । यह ज्ञान सदा आवरण रहित रहता है । श्रतएव इतना ज्ञान सदा बना रहता है, यदि इसका प्रभाव मान लिया जाय तो जीव का नाश ही हो जाय । क्योंकि उपयोग ही जीव का लक्षण है । यदि उसका भी नाश मान लिया जायेगा, तो जीव काही प्रभाव हो जायेगा । इसलिए जीव के कम से कम इतना ज्ञान अवश्य रहता है । सो ही लिखा है । [902 सुमरिगोद प्रपज्जत, यस्स जावस्स पढमसमयि हवदि हु सवजह रिगच्चुग्धाडं गिरावर ॥८२॥ २. पर्याय समास - जब पर्याय श्रुत ज्ञान अनंतभाग वृद्धि असंख्यात भांग वृद्धि, संस्थान भाग वृद्धि, संख्यात गुण वृद्धि, असंख्य गुण वृद्धि, अनंत गुण वृद्धि, इस प्रकार पर गुणी वृद्धि होते-होते जब प्रसंख्यात लोक प्रमाण हो जाता है, तब उसको 'समास' ज्ञान कहते हैं । प्रक्षर तज्ञान से पहले तक 'समास' कहलाता है। ३. अक्षर श्रुतज्ञान-प्रकार आकार आदि प्रक्षर रूप श्रुत ज्ञान को अक्षर ज्ञान कहते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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