SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 469
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३८० ] [ गो. प्र. चिन्तामि ४. प्रक्षर समास--अक्षर तज्ञान से ऊपर पद श्रवज्ञान से नीचे जो श्रुतज्ञान के भेद हैं, उनको 'अक्षर समास' कहते हैं । ५. पदभुत---अक्षर श्रुतज्ञान के श्रागे क्रम-क्रम से अक्षरों की वृद्धि होतेहोते जब संख्यात अक्षरों की वृद्धि हो जाती हैं, तब उस ज्ञान को पदश्रुत ज्ञान ' कहते हैं । ६. पदसमासपद तज्ञान के श्रागे संघात श्रुतज्ञान होने तक श्रुत ज्ञान के जितने भेद हैं, उन सबको पद समास' कहते हैं । ७. संघात -- एकपद ज्ञान के आगे एक एक ग्रक्षर की वृद्धि होते, जब संख्यात हजार पदों की वृद्धि हो जाती है, तब यह संघात ज्ञान होता है, यह ज्ञान चारों गतियों में से किसी एक गति का वर्गान कर सकता है । ८. संघात समास - प्रक्षरों के द्वारा बढ़ता हुआ जो वासलेकर प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान तक जाता है, उसको 'संघात समास' श्रुतज्ञान कहते हैं ९. प्रतिपत्ति ज्ञान - संघात समास में बढ़ते-बढ़ते जब संख्यात हजार संघातों की वृद्धि हो जाय तब प्रतिपत्ति श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञान के द्वारा चारों गतियों का स्वरूप बन किया जा सकता है । १०. प्रतिपत्ति समास - प्रतिपत्ति ज्ञान से ग्रागे जब संख्यात प्रतिपत्ति रूप ज्ञान बढ़ जाता है, तब अनुयोग से पहले तक उसको 'प्रतिपति समास' कहते हैं । ११. अनुयोग - प्रतिपत्ति समास से एक एक प्रक्षर की वृद्धि होते जब संख्यात हजार प्रतिपत्ति की वृद्धि हो जाती है, तब एक अनुयोग श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञान से चौदह मार्गाओं का स्वरूप जाना जाता है । १२. अनुयोग समास - अनुयोग जान से आगे और प्राभृत-प्राभृत ज्ञान से पहले जितने ज्ञान के विकल्प हैं, सब अनुयोग समास है । १३. प्रामृत प्राभृत--- अनुयोग ज्ञान के आगे एक-एक अक्षर की वृद्धि होतेहोते संख्या अनुयोग होने पर प्रामृत प्राभूत ज्ञान होता है । प्राभृत शब्द का अर्थ अधिकार है । वस्तु नामक शुतज्ञान के अधिकार को प्राभृत और उसके भी अधिकारों को प्राभृत प्रामृत कहते हैं । १४. प्रामृत - प्राभृत समास- प्राभृत प्राभृत से बागे और प्राभृत से पहले तक agart के जितने विकल्प है, उन सबको 'प्राभृत- प्राकृत समास' कहते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy