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________________ अध्याय : पांचवां । [ ३८५ . १५. प्राभूत-प्राभृत-प्राभृत ज्ञान की वृद्धि होते-होते जत्र चौबीस प्राभृत हो . जाते हैं, तब एक 'प्रामृत ज्ञान होता है। १६. प्रामृत समास-----प्रामृत से ऊपर और वस्तु में नीचे जो थुतजान के .. विकल्प हैं, उन सब को 'प्राभृत समास' कहते हैं। .. १७. वस्तु २ त ज्ञान--प्राभूत ज्ञान की वृद्धि होते-होते जब बीस प्राभूत बढ़ जाते हैं, तब 'वस्तु श्रुतज्ञान' होता है.।। १८. बस्तु समास-~-वस्तु ज्ञान से ऊपर क्रम से अक्षर पदों की वृद्धि होतेहोते दस वस्तु ज्ञान की वृद्धि हो जाय उसमें से एक अक्षर कम तक जो ज्ञान के विकल्प हैं. उनको वस्तु समास ज्ञान कहते हैं। १६. पूर्वश्रुत--पूर्व ज्ञान के चौदह भेद हैं | वस्तु समास के अन्तिम भेद में अक्षर मिलाने से उत्पाद पूर्व होता है । २०. उत्पाद पूर्व समास-उत्पाद पूर्व में भी वृद्धि होते-होते चौदह वस्तु पर्याय वृद्धि होने पर उसमें से एक अक्षर कम करने से उत्पाद पूर्व समास ज्ञान होता है। 23 उसमें एक अक्षर बढ़ाने से अग्रायम्गीय पूर्व और उसकी वृद्धि होते-होते . .. अग्रायणीय पूर्व समास होता है । इसी प्रकार यारो के पूर्व और पूर्व समास समझने • चाहिये। इस प्रकार यह द्वादशांग श्रुतज्ञान अनन्त पदार्थों को विषय भुत करने से अत्यन्त गम्भीर है और अबाधित विषय होने से अत्यन्त श्रेष्ठ है, इस प्रकार की शास्त्र प्रणाली के अनुसार वह श्रुतज्ञान बारह प्रकार का है। ऐसे श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता हूँ। ..... श्र तज्ञान के बारह भेदों का स्वरूप--- प्राचारं सूत्रकृतं, स्थानं समवाय नामधेयं च । .. व्याख्या प्रप्ति च, ज्ञातृकथोपासकाध्ययने ।।८८३॥ वन्देन्तकृदृशः मनुत्तरोपपादिक दशं दशावस्थम् ।.. प्रश्न व्याकरणं हि, विषाक सूत्रं च दिनमामि ।।८८४॥ अंगप्रवृष्ट श्रुत ज्ञान के बारह भेद हैं। उनके नाम ये हैं..... प्राचारांग; २. सूत्रकृतांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. व्याख्या प्रजात्यंग, ६. ज्ञातृकथांग, . : :
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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