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| गो. प्र. चिन्तामणि ७. उपासकाध्ययनांग, ८. अंतकृशांग, ६. अनुत्तरोपपादिक दशांग, १२. प्रश्न व्याकरणांग, ११. विपाक सूत्रांग और १२. दृष्टि वादांग । इन बारह भेदरूप श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता हूँ।
इन बारह अंगों को पद संख्या और स्वरूप
वस्तुत श्रुत ज्ञान के दो भेद हैं, एक द्रव्य श्रुत और दूसरा भाव श्रुत । द्रव्य श्रुत की रचना शब्दात्मक है, इसलिए उसकी पद संख्या कही जा सकती है; पण माजश्रुत जानवर है, इसलिए असली पद संख्या आदि कुछ नहीं कही जा सकती।
१. प्राचारांग- इसकी पर संख्या अधारह हजार और इसमें गुप्ति समिति आदि मुनियों के प्राचरणों का वर्णन है ।
द्वादशांग श्रुतज्ञान में प्राचारांग को सबसे पहले स्थान मिला है । इसकर कारण यह है कि मोक्ष का साक्षात् कारण मुनि मार्ग है । और वह गुप्ति समिति पंचाचार दशधर्म प्रादि रूप है । इन सबका वर्णन आचारांग में हैं। इसलिये सबसे पहले यही कहा है । अथवा भगवान् अरहंतदेव ने अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा मोक्षमार्ग का निरूपण किया उसी को सुनकर गणधरदेव ने द्वादशांग श्रुतज्ञान की रचना की, उसमें से सबसे पहले मोक्ष का साक्षात् कारण होने के कारण अचारांग सबसे पहला अंग कहा है।
२. सूत्रकृतांग-इसमें ज्ञान की प्राप्ति के लिये ज्ञान का विनय और अध्ययन के कारण आदि का वर्णन है, इसको पद संख्या छत्तीस हजार है।
३. स्थानांग- इसमें जीवादिक द्रव्यों के एक से लेकर अनेक स्थानों तक का वर्णन किया है । जैसे संग्रहनय से प्रारमा एक है । संसारी मुक्त के भेद से. दो प्रकार का है । उत्पाद व्यय प्रौव्य की अपेक्षा तीन प्रकार का है । गतियों की अपेक्षा से चार प्रकार का है । औपशमिक, क्षायिक, क्षयोपशिमक, प्रौदयिक, पारिणामिक भावों की अपेक्षा से पांच प्रकार का है। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे इन छह दिशाओं की ओद (विग्रह गति में) गमन करने के कारण छह प्रकार का है । स्यात् अस्ति, स्यात्नास्तिः प्रादि सप्त भंगों की अपेक्षा से सात प्रकार का है । पाठ कर्मों के प्रतिक्षण प्रास्त्रव की अपेक्षा सेल आठ प्रकार का है । नव पदार्थ रूप स्वरूप की अपेक्षा
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