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________________ अध्याय : पांचवां ] से नौ प्रकार का है 1 पृथ्वी कायिक, जल कायिक, वायु कायिक, अग्नि कायिक, प्रत्येक साधारण, दो इन्द्रिय, त्रि इन्द्रिय, चौ न्द्रिय, पंचेन्द्रिय के भेद से इस प्रकार का है, इस प्रकार जीव के अनेक भेद हैं। इस प्रकार पुद्गल धर्म अधर्म आदि समस्त द्रव्यों के विकल्प समझने चाहिये । सब भेद स्थानांग में निरूपण किये गये हैं । इस अंग की पद संख्या बयालीस हजार है। ४. समवायांग- इसमें द्रध्य क्षेत्र काल भाव की अपेक्षा से द्रव्यों में जो परस्पर समानता हो सकती है, वह दिखलाई है । जैसे १. धर्म द्रव्य, २. अधर्म द्रव्य ३ लोकाकाश और ४. एक जीव के प्रदेश समान हैं, यह द्रव्य की अपेक्षा समानता है । १. जंबूद्वीप, २. अप्रतिष्ठान नरक, ३. नन्दीश्वर द्वीप की बावड़ियों और ४. सर्वर्थसिद्धि विमान समान क्षेत्र के हैं । यह क्षेत्र कृत समानता है । १. उत्सपिगी, २. अवसर्पिणी दोनों का काल समान हैं । यह काल की समानता है। १. क्षायिक ज्ञान और २. क्षायिक दर्शन दोनों समान हैं । यह भाषकृत समानता है। इस प्रकार समानता को निरूपण करने वाला समवायांग हैं। इसकी पद संख्या एक लाख चौसठ हजार है। ५. व्याख्या सजायंग-जीद है आमा नहीं है, इस प्रकार गणधर देव ने साठ हजार प्रश्न भगवान परहंतदेव से पूछे ! उन सब प्रश्नों का तथा उनके उत्तरों का वर्णन इस अंग में है। इसकी पेद संख्या दो लाख अट्ठाईस हजार हैं। ६ मातृकथांग-~-इसमें भगवान् तोर्थकर परमदेव और गरगधर देवों की कथानों का लथा उपकथानों का वर्णन है। अन्य महापुरुषों की कथाएँ. भी उसी में हैं । इसकी पद संख्या पांच लाख छापन हजार है । ७. उपासकाध्ययनांग--इसमें श्रावकों के समस्त आचरण, क्रिया, अनुष्ठान आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या ग्यारह लाख सत्तर हजार है। ८. अन्तकृशांग-~-प्रत्येक तीर्थकर के समय में दश-दश मुनीश्वर ऐसे होते हैं, जो भयंकर उपसर्गों को सहन कर समस्त कमों का नाश कर मोक्ष जाते हैं, उनका वर्शन इस अंग में है। संसार का अंत करने वाले दश-दश मुनियों का वर्णन जिसमें हो उसको अंत कृदशांग कहते हैं । इसकी पद संख्या तेईस लाख अट्ठाईस हजार है। ६. अनुत्तरोपपादिक वशांग--प्रत्येक तीर्थंकर के समय में दश मुनि ऐसे होते हैं, जो घोर उपसर्ग सहन कर समाधि मरगा से अपने प्राणों का त्याग करते हैं और विजय, वैजयन्त, जयन्त. अपराजित और सर्वार्थ सिद्धि इन अनुत्तर विमानों में उत्पन्न
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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