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३.४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
होते हैं । इन सबका वर्णन इस अंग में है ! इनकी पद संख्या बानवे लाख चवालीस
हजार है।
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१०. प्रश्न व्याकरणांम----जो वस्तु खो गई है या मुट्ठी में है वा और कोई चिंता का विषय हो, उन सब प्रश्नों को लेकर उनका पूर्ण यथार्थ व्याख्यान का समाधान का वर्णन इस अंग में है । इसकी पद संख्या तिरानवे लार्ख सोलह हजार है ।
११. विपाक सूत्रांग-- इसमें अशुभ कर्मों का उदय शुभ कर्मों का उदयं तथा उनका फल वर्णन किया है । इसकी पद संख्या एक करोड़ चौरासी लाख है।
- इस प्रकार ग्यारह अंगों की पद संख्या चार करोड़ पन्द्रह लाख दो हजार है । ऐसे श्रुतज्ञान को मैं नमस्कार करता हूं।
१२. बारहवें अंग दृष्टिवाद के लक्षण और भव-- परिकर्म च सूत्रं च, स्तौमि, प्रथमानुयोग पूर्व गते। . साद्धं चूलिकयापि च, पंचविध दृष्टिबादं च ॥६॥
दृष्टिबाद नाम के बारहवें अंग के पांच भेद हैं । १. परिकर्म, २. सूत्र, ३. प्रश्रमानुयोग, ४. पूर्वगत, और ५. चूलिका इन सबको मैं नमस्कार करता हूँ।
१. परिकर्म--जिसमें गणित की व्याख्या कर उसका पूर्ण विचार किया हो उसको परिकर्म कहते हैं । इसके पांच भेद हैं-१. चन्द्र प्रज्ञप्ति, २. सूर्य प्रज्ञप्ति ३. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, ४. द्वीप सागर प्राप्ति और ५. व्याख्या प्रज्ञाप्ति ।
चन्द्र प्रज्ञप्ति--इसमें चन्द्रमा की आयु, गति, परिवार, विभूति आदि का वर्णन है, इसकी पद संख्या छत्तीस लाख पांच हजार है।।
सूर्य प्रज्ञप्ति- इसमें सूर्य की प्रायु, गति, परिवार, विभूति ग्रहरण प्रादि का वर्णन है। इसकी पद संख्या पांच लाख तीन हजार है ।
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति--इसमें जम्बूद्वीप सम्बन्धी सात क्षेत्र, कुलाचल पर्वत सरोवर नदियां आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या तीन लाख पच्चीस हजार है।
द्वीपसागर प्रज्ञप्ति--इसमें असंख्यात द्वीप समुद्रों का वर्णन है। उन द्वीप समुद्रों में रहने वाले अकृत्रिम चैत्यालय ज्योतिष व्यंतर ग्रादि सबका वर्णन है । इसकी पद संख्या बावन लाख छत्तीस हजार है।
व्याख्या प्रज्ञप्ति---इसमें जीवाजीवादिक द्रव्यों का स्वरूप, उनका रूपो, अरूपीपना आदि का वर्णन है । इसकी पद संख्या बौरासी लाख छत्तीस हजार है।
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