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________________ अध्याय : पांचवां ] । ३८५ २. सूत्र-~~इसमें जीद कर्मों का कर्ता है, उनके फल को भोक्ता है, शरीर परिमारण है, इत्यादि पदार्थों का यथार्थ स्वरूप निरूपण किया है, तथा यह जीव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु से उत्पन्न नहीं हुआ है, अणु मात्र नहीं है, सर्वगत नहीं है, इत्यादि रूप से अन्य मतों के द्वारा माने हुए पदार्थों के स्वरूप का खंडन है, इसकी पद संख्या अठासी लाख है । ३. प्रथमानुयोग-~~-इसमें श्रेसठ शलाका पुरुषों के चरित्र व पुराणों का निरूपण है । इसकी पद संख्या पांच हजार है। ४. पूर्वगत---इसमें समस्त पदार्थों के उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य आदि का बर्णन है। इसकी पद संख्या पिचानवे करोड़ पचास लाख पांच है । ५. चूलिका के पांच भेद हैं--जलगता, स्थलगता, मायागता, रूपगता और आकाशगता । .. जलगता-इसमें जल में गमन करने के लिये तथा जल का स्तम्भ करने के लिये जो कुछ मंत्र, संथ व तपश्चरण कारण है, उन सब का वर्णन है । इसकी पंद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है। स्थलगता---इसमें पृथ्वी पर गमन करने के कारण मंत्र तंत्र और तपश्चरणों का वर्णन है । पृथ्वी पर होने वाली जितनी वास्तु विद्याएँ हैं मकान बनाने आदि की विद्याएँ उन सबका वर्णन है। इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है । मायागता--- इसमें इन्द्रजाल सम्बन्धी मंत्र, तंत्रों का वर्णन है, इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है । रूपगता- इसमें सिंह, व्याघ्र, हिरण प्रादि के रूप धारण करने के मंत्र, तंत्रों का वर्णन है तथा अनेक प्रकार के चित्र बनाने का वर्णन है । इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ है । अाफाशगता---इसमें आकाश में गमन करने के कारण मंत्र तंत्र और तपश्चरण का वर्णन है। इसकी पद संख्या दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार MUNASPARASIMHARIRE
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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