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[ गो. प्र. चिन्तामरि
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मृगेन्द्र विष्ट रारुढं दिव्या तिशय संयुतम् । कल्याण महिमोपेतं देव दैत्योरगाचितम् ॥ ४४७॥ विलोनाशेष कर्मारणं स्फुरन्त मति निर्मलम् । स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ||४४८॥ तत्पश्चात् अपने श्रात्मा के अतिशय युक्त सिहासन पर ग्राम कल्याण की महिमा सहित देव दानव धरणेंद्रादि से पूजित है, ऐसा चित्तवन करें। तत्पश्चात् विलय हो गये हैं आठ कर्म जिसके ऐसा स्फुरायमान (प्रगट ) अंति निर्मल पुरुषाकार अपने शरीर में प्राप्त हुए अपने आत्मा का चितवन करे। इस प्रकार तत्त्वरूपवती धारा कही गई । चित्र नं० १२ ।
इत्यविरतं स योगी विजातश्विलाभ्यासः ।
शिव सुखमनन्य साध्यं प्राप्नोत्यचिरेण कालेन ॥ ४४६ ॥
इस प्रकार पिस्थ ध्यान में जिसका निश्चल अभ्यास हो गया है वह ध्यानी मुनि अन्य प्रकार से सावने में न यावे ऐसे मोक्ष के सुख को शीघ्र ( अल्प समय में ) हो प्राप्त होता है ।
इत्थं यत्रानवद्यं स्मरति नव सुधा सान्द्र चन्द्रांशुगौरं । श्रीमत्सर्वज्ञकल्पं कनक गिरितटे वीत विश्वप्रपञ्चम् ॥ श्रात्मानं विश्वरूपं त्रिदशगुरु गणैरप्य चित्यप्रभावं । तत्पिण्डस्थं प्रणीतं जिन सन्य महाम्भोधिपारं प्रयातः ।।४५० ।।
उक्त प्रकार से जिस पिण्डस्थ ध्यान में निर्दोष, नये अमृत से भीगी हुई. चन्द्रमा की किरण सदृश-गोरे वणं, श्रीमत्सर्वेश भगवान् समान तथा मेरु गिरी के तट वा शिखर पर बैठा, बीते है समस्त प्रपंच जिसके ऐसे तथा विश्वरूप- समस्त ज्ञेय पदार्थों के प्राकार जिसमें प्रतिविम्बित हो रहे हैं, ऐसे देवेंद्रों के समूह से भो जिसका विक प्रभाव हो ऐसे आत्मा का जो चिन्तवन किया जाय, उसको जिन सिद्धान्त रूपी महासमुद्र के पार पहुँचने वाले मुनिश्वरों ने frosts ध्यान कहा है । विद्यामण्डलमन्त्रयन्त्र कुककूराभिचाराः क्रियाः । सिंहाशो विष दैत्यदन्ति शरभा यान्त्येव निःसारताम् ।। शाकिन्यो ग्रह राक्षसप्रभृतयो मुञ्चन्त्यसद्धासनां । एतानधनस्य सन्निधिवशादानोर्यथा कौशिकाः ||४५१ ॥