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________________ अध्याय : पांचवा 1 [ २५५ जिस प्रकार मूर्य के उदय होने पर उलक (घूघ) भाग जाते हैं, उसी प्रकार इस पिण्डस्थ ध्यानरूपी धन के समीप होने से विद्या, मंडल, मंत्र, यन्त्र, इन्द्रजाल के ग्राश्चर्य (प्रसिद्ध कपट) क्रूर अभिचार (मरमादि) स्वरूप किया तथा सिंह, प्राशीविप (सप) दैत्य हस्ती अष्टापद ये सब ही निःसारता को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् किसी प्रकार का उपद्रव नहीं करते तथा शाकिनी ग्रह राक्षस वगैरह भी खोटी वासना को छोड़ देते हैं। भावार्थ : -पिण्वस्थ ध्यान के प्राप्त होने वाले मुनि के निकट कोई दुष्ट जीब किसी प्रकार का उपद्रव नहीं कर सकते, समस्त विघ्न दूर से नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार पिण्डस्थ गान का वर्णन किया । यहाँ कोई ऐसा कहें कि ध्यान तो ज्ञानानन्द स्वरूप प्रात्मा का ही करना है। इतनी पृथ्वि, अग्नि, पवन, जलादिक की कल्पना किस लिये करनी ? उसको कहा जाता है कि : __यह शरीर पृथ्वि आदि धातुमय है और सूक्ष्म पुद्गल कर्म के द्वारा उत्पन्न हुया है। उसका पात्मा के साथ संबंध है; इनके संबंध से आत्मा द्रव्य भाव रूप कलंक से उत्पन्न होते हैं। उन विकल्पों के निमित्त से परिणाम निश्चल नहीं होते । उनको निश्चल करने के लिये स्वाधीन चिन्तबनों से चित्त को वश करना चाहिये । सो ध्यान में किसी का पालम्बन किये बिना चित्त निश्चल नहीं होता, इस कारण उसको अलम्बन करने के लिए पिण्डस्थ ध्यान में पृथ्वि आदि पांच प्रकार की कल्पना स्थापन की गई है । सो, प्रथम तो पृथ्वि संबंधी धारणा से मन को थामे, तत्पश्चात् अग्नि धारणा से कर्म और शरीर को दग्ध करने की कल्पना करके मन को रोके । तत्पश्चात् पवन की धारणा को कल्पना करके शरीर तथा कर्म की भरम. को उड़ाकर मन को थांभे, तत्पश्चात् जल की धारंगा से उसमें से बचा बचाई रज को धो देने रूप ध्यान से मन को थांभे, तत्पश्चात् प्रात्मा शरीर और कर्म से रहित शुद्ध ज्ञानानंदमय कल्पना करके, उसमें मन का स्तंभन करे। इस प्रकार मन को थाभते-थाभते . अभ्यास के करने से ध्यान का दृढ़ अभ्यास हो जाता है, तब आत्मा शुक्ल ध्यान में ... - ठहरता है, उस समय घाति कमों का नाश करके केवल ज्ञान की प्राप्ति हो कर मोक्ष हो जाता है तथा अन्य मती भी इसी प्रकार पार्थिवी आदि बारणा करने को कहते हैं; परन्तु उनके आत्म तत्त्व का यथार्थ निरूपण नहीं होने के कारण उनके यहाँ सत्यार्थ . धारणा नहीं होती, कुछ लौकिक चमत्कार सिद्ध हो तो हो जानो, परन्तु मोक्ष की प्राप्ति
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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