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.. .... [ गो. प्र. चिन्तामणि तो यथार्थ तत्त्व के श्रद्धान ज्ञान प्राचरण बिना होती ही नहीं। इस कारण इसमें मुन्देह नहीं करना।
* पदस्थ-ध्यान पदान्यालम्ब्य पुण्यानि योगिभिर्यद्विधीयते । तत्पदस्थं मतं ध्यान विचित्र नय पारगः ॥४५२॥
जिसको योगीश्वर पवित्र मंत्रों के अक्षर स्वरूप पदों का अवलम्बन करके चितवन करते हैं, उसको अनेक नयों के पार पहुँचने वाले योगीश्वरों ने पदस्थ ध्यान कहा है। वर्णमातृका ध्यान का स्वरूप--
ध्यायेदनादि सिद्धान्त प्रसिद्धां वर्णमातृकाम् । निःशेष शब्द विन्यास जन्म भूमि जगन्नताम् ।।४५३॥
अनादि सिद्धान्त में प्रसिद्ध जो वर्गमातका अर्थात् अकारादि स्वर और ककारादि व्यञ्जनों का समूह है, उसका यिन्तवन करे, क्योंकि यह वर्ण मातृका सम्पूर्ण शब्दों के रचना की जन्म भूमि है और जंगत से वंदनीय है।
द्विगुणाष्टवलाम्भोजे निाभिमण्डल तिनि ।। भ्रमन्ती चिन्तयेद्धयानी प्रतिपत्रं स्वरावलीम् ॥४५४॥ .
ध्यान करने वाला पुरुष नाभि मंडल पर स्थित सोलह दल (पॅखडी) के कमल में प्रत्येक दल पर कम से फिरती हुई स्वरावली का अर्थात् अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः इन अक्षरों का चिन्तवन करें।
चतुविशति पत्राढयं हृदि कर्ज सरिपकम् ।
तत्र वा निमान्ध्यायेत्संयमी पञ्चविंशतिकम् ।।४५५॥ . . . तत्पश्चात् ध्यानी अपने हृद्रय स्थान पर कणिका सहित चौबीस. पत्रों का कमल संयमी मुनि चिन्तवन करके उसकी करिणका तथा पत्रों में क ख ग घ ङ च छ. जं झाट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म इन पच्चीस अक्षरों का ध्यान करे ।
ततो वदन राजीवे : पत्राष्टक विभूषिते । परं वधिक ध्यायेत्सञ्चरन्तं प्रदक्षिणम् । ४५६॥