SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 317
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ स अध्याय : पांचवां । रूप करता हुआ । तथा लोक के मध्य गमन करता हुया, दशों दिशाओं संचरता हुना, जगत रूप में घर में फैला हुना । पृथ्वि तल में प्रवेश करता हुआ चिन्तवन करे । तत्पश्चात् ध्यानी (मुनि) ऐसा सिसवन सरे किचन जो रीसदिक की भस्म है, उसको उस प्रबल वायुमंडल ने तत्काल उड़ा दिया, तत्पश्चात् इस वायु को स्थिर रूप चिन्तबन करके शान्त रूप करे । चित्र नं १७ । वारुणी धारण का स्वरूप बारुण्या स हि पुण्यात्मा घन जाल चितं नमः । इन्द्रायुधडिगार्जच्चमत्काराकुलं स्मरेत् ॥४४२॥ वही पुण्यात्मा (ध्यानी मुनि ) इन्द्र धनुष, बिजली, गर्जनादि चमत्कार सहित मेघों के समूह से भरे हुए अाकाश का ध्यान (चिन्तवन) करे । सुधाम्बु प्रभवः सान्द्र बिन्दुभिमौक्ति कोज्ज्वलः। वर्षन्तं तं स्मरेद्धोरः स्थूलस्थूले निरन्तरम् ।।४४३॥ - तथा उन मेघों को अमृत से उत्पन्न हुए मोती समान उज्ज्वल बड़े-बड़े बिन्दुओं से निरन्तर धारा रूप बर्षते हुए अाकाश को धीर, वीर मुनि स्मरण करे. अर्थात् ध्यान करे । चिश्न नं० ११। ततोऽन्दुसम कान्तं परं वरुणलाञ्छितम् ।. . ध्यायेत्सुधापयः परः ल्पावयन्तंनभस्तलम् ॥४४४।। ... तत्पश्चात अर्द्धचन्द्राकार, मनोहर, अमृत मय जल के प्रवाह से आकाश को बहाते हुए वरापुर (बरुणमंडल) का चिन्तवन करे । तेनाचिन्त्यप्रभावेरा, दिव्यध्यानोत्थिताम्बुना । प्रक्षालयति निःशेषं . तद्रजः कायसंभवम् ।।४४५॥ अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे दिव्य ध्यान से उत्पन्न हुए जल से शरीर के जलने से उत्पन्न हुए समस्त भस्म को प्रक्षालन करता है अर्थात् धोता है, ऐसा चिन्तवन करे। सप्तधातु विनिमुक्तं पूर्णचन्द्रामलत्विषम् । . सर्वज्ञकल्पमात्मानं ततः स्मरति संयमी ॥४४६॥ तत्पश्चात् संयमी मुनि सप्त धातु रहित, पूर्ण चन्द्रमा के समान है निर्मल प्रभा जिसकी से सर्वज्ञ समान अपने ग्रात्मा का ध्यान करे ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy