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भूमि स्पर्श - सिद्ध भक्ति होने पर हाथ से भूमिका स्पर्श हो जाये तो ग्रन्तराय है ।
अध्याय : पाँचवां ]
२५.
२६. निष्ठीवन - कफ, थूक आदिक यदि मुनि के द्वारा जमीन पर किया जाय तो अन्तराय होता है । हाथ से मुनि भूमि पर कुछ वस्तु ग्रहण करे तो अन्तराय होता है ।
प्रदत्तग्रहणं पहारगामडाहो ।
उदरविकभिणि आमणं पादेख किनि गनुमं
करेण वा जं च भूमिए ॥ ६६६ ॥
उदर क्रिमि निर्गमन - पेट में से यदि कृमि निकले तो अंतराय होता है । प्रदत्त ग्रहण - नहीं दी हुई वस्तु का ग्रहण करना ।
प्रहार - अपने ऊपर अथवा अन्य के ऊपर प्रहार हो तो ।
ग्राम दाह--गांव में यदि श्राग लगी हो तो ।
पादेन किञ्चिद्ग्रहणं - पाद से पांच से यदि कुछ वस्तु भूमि पर से ग्रहण की जाय तो आहार का अंतराय होता है ।
एदे श्रणे बहुगा कारण भूदा प्रभोजणस्सेह |
वोह लोग दुर्गा रंग संजम स्पिव्वेदठठं च ॥ ६६७॥
पूर्वोक्त सर्व काकादिक अंतराय भोजन त्याग के अंतराय माने गये हैं । इनसे भी भिन्न दूसरे भोजन त्याग के हेतु माने हैं । वे इस प्रकार चांडालादि स्पर्श, कलह, इष्ट मरण, साथमिक संन्यास पतन, प्रधान मरण वगैरह । इन अंतरायों का पालन करना चाहिये । ये प्रन्तराय राज भय, लोकनिंदा यदि होगी तो संयम पालन के लिए व वैराग्य के लिये धारण करना चाहिये ।
चौदह मलों का वर्णन -
हरोमजंतु अठी कण कुंडयपूय चम्म रूहिरमंसारिण ।
बी फल कंद मूला खिष्णाणि भला चउदसा होंति ।। ६६८ ॥ मनुष्य अथवा तिर्यच के हाथ पैरों के नख, रोम-मनुष्य अथवा पशु का केश, जन्तु - मरा हुआ प्राणी ( द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय मरा हुवा प्राणी) अर्थात् . हीन्द्रियादि विकलत्रय जीवों का मृत शरीर । अठ्ठी अस्थि । १. करण-जी, गेहूँ वगैरह धान्य का बाह्य अवयव, २. कुडक-शालि वगैरह धान्य का अंदर का सूक्ष्म अवयव ।
-पका हुआ रक्त जखम में उत्पन्न होने वाला पीव । चर्म शरीर का चमड़ा - पहिला,