________________
[ गो. प्र. चिन्तामरिग
धातु, रुहिर-रक्त दूसरी धातु, गांव रत को मायामात दीयमातु, ६. बीज-अंकुर होने योग्य जौ, गेहूँ प्रभृति धान्य, फल-बीजसहित आम्र, बेर, वगैरह फल, कंद-जमीन में उत्पन्न होने वाला अंकुर की उत्पत्ति का कारण अथवा सूरण बगैरह्, मूल पीपल वगैरह वृक्षों के जड अदरख वगैरह चौदह मल हैं। इनमें कोई महा मल है, कोई अल्प मल-अल्प दोष है । रक्त, मांस, अस्थि, चमडा, पोव ये महादोष हैं । पाहार में इनके दर्शन से सर्व आहार का त्याग करके प्रायश्चित भी लेना चाहिये । द्वीन्द्रियादि विकलश्रिक का शरीर और बाल अन्न में यदि दिख पड़े तो ग्राहार त्याग करना चाहिये। नख दिन पड़ा तो आहार त्याग के साथ अल्प प्रायश्चित्त लेना चाहिये । अंकुरोत्पन्न धान्य, करण, कुंड, बीज, कंद, फल और मुल ये अन्न से अलग कर याहार कर सकते . हैं । अन्यथा आहार का त्याग करना चाहिये । सिद्ध भक्ति करने पर अपने शरीर में से अथवा भोजन परोसने वाले के शरीर से रक्त पीव यदि गलने लग जाय तो याहार . . का त्याग करना चाहिये ।
पिण्डशुद्धि आदि का वर्णन पिण्डशुद्धि के पाठ भेदों का स्वरूप
उगम उत्पादण एसणं च संजोजणं पमारणं च ।
इंगाल घूम कारण अथिहा पिण्डसुद्धी दु ।।६६६।। .. अर्थ-उद्गम दोष, उत्पादन दोष, एपणा दोष संयोजन दोप, प्रमाण दोष, इंगाल दोष, धूम दोष और कारण दोघ ऐसे पिण्ड शुद्धि के पाठ दोप है। इन दोषों से रहित पिण्डशुद्धि होती है। तात्पर्य - पियशुद्धि के दोषों के सामान्य अाठ भेद हैं और विशेष भेदों का वर्णन आगे क्रम से प्राचार्य करेंगे ।
उद्गम दोष-दाता के रत्नत्रय का नाश करने वाले अभिप्रायों के द्वारा पाहार, श्रीपर, वसति और उपकरणों में जो दो दोष उत्पन्न होते हैं, उनको उद्गम दोष कहते हैं।
• उत्पादन दोष-यति के रत्नत्रय का नाश करने वाले अभिप्रायों के द्वारा जो ..: . दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हें उत्पादन दोष कहते हैं ।
. एषणा दोष-जो मुनि के करपुट में आहार अर्पण करते हैं - परोसते हैं, . उनसे होने वाले दोषों को एपणा दोष कहते हैं ।