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अध्याय : पांचवां ]
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संयोजन दोष --- संयोग से होने वाले दोष को संयोजन दोष कहते हैं । प्रमरणातिरेक दोष — प्रमार से अधिक आहार लेना । इंगाल दोष – लम्पटता से आहार लेना ।
धूम दोष-निंदा से प्रहार लेना ।
कारण दोष---विरूद्ध कारणों से बना हुया याहार लेना । ऐसे पिण्डशुद्धि के दोषों के आठ विभाग कहे है । उद्गम दोषों का नामनिर्देश
उद्गम दोषों का नाम निर्देश
आधाकमुद्द सिय अभोवज्से यं पूदि मिस्से व । ठविदे बलि पाहुडिदे पादुक्कारे व कीदे य ॥७००॥ पमिच्छे परियहे अभिमुषिभण माल आरोहे | छज्जे श्रणिट्ठे उगमदोसा दु सोलसिमे ||७०१ ॥
श्रधः कर्म -- यह दोष गृहस्थाश्रित है । इसमें पंचशूना होती हैं । अर्थात् पानी भरना, भावना, रसोई करना, धान्य कूटना और पीसना इन कार्यों से
काय जीवों की विराधना होती है । विराधनारूप यह महादोष है । आठ प्रकार के freefer के दोषों से frन्न है, यह महादोष । निकृष्ट प्रवृत्ति को प्रथः कर्म कहते हैं। पकाय जीवों के समूह का इसमें बब होने से यह महादोष हैं ।
श्री शिक—उद्देश्य से आहार बनाना । अध्यधि-मुनियों को देखकर आहार बनाने को प्रारम्भ करना । पूति प्रासुक और अप्रासुक मिश्र श्राहार |
मिश्र असंयतों के साथ मुनि को आहार देना ।
स्थापित --- अपने घर में अथवा अन्य के घर में स्थापन किया हुआ प्रहार | बलि ---यक्षादिकों को अर्पण करके अवशिष्ट रहा हुआ आहार | प्रातकाल की हानि वृद्धि करके बनाया हुआ आहार |
प्राविष्करण बाहार के लिये साधु आने पर पडदा हटाना, भाजन भस्म से मांजना इत्यादि ।
बनाना ।
कीत - अन्न खरीदकर लाना ।
प्रामृष्य -- ऋण लेकर ग्राहार बनाना ।
परिवर्तन - शालि यादि देकर उसके बदले में ग्रन्य धान्य लेकर आहार
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