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[ गो. प्र. चिन्तामणि
अभिघट - अन्य स्थान से अन्न लाकर मुनि को देना । उद्भन्न—उद्भन्न-भाजन के ऊपर का बंधन निकालकर आहार देना | मालारोह - घर के ऊपर सीडियों से बढकर आहार की वस्तु लाकर मुनि को ग्राहार देना
प्राच्छेद्य राजादि के भय से आहार देना ।
अनीशार्थ --- अप्रधान दाताओंों ने दिया हुआ याहार | ऐसे उद्गमादिक सोलह दोष हैं । इनका क्रम से वर्णन करते हैं । गृहस्थाश्रित अधः कर्म दोष का स्वरूप-
छज्जीवणिकायाणं विराहयोछावरणादिपिप्प
धाकम्म णेयं.
सयपरकदमादसंपणं ॥ ७०२ ॥
यह अधः कर्म दोष षट्काय जीवों की विराधना से होता है । अर्थात् पृथ्वी, जल ग्रग्नि, वायु, वनस्पति और बस जीवों को दुःख देना उसको विराधना कहते हैं । उद्घावन-जीवो का वध करना । जीवों को पीडा देकर और उनका नाश कर जो आहार बनाया जाता है, उस ब्रांहार को भी अधः कर्म दोष कहते हैं । यह दोष स्वयं करना, पर के द्वारा कराना, श्रथवा दूसरों ने किये दोप को अनुमति देना । जीवों को पीडा देकर और उनका नाश कर यह दोष मुनि करेंगे तो उनका मुनियना नष्ट होगा । इसमें वैयावृत्यादिक गुण नहीं होने से मुनियों को यह कार्य सर्वथा वर्ज्य है । वैयावृत्यादिक से रहित और स्वतः के आहार लिये भोजन बनाना बटुकाय जीवों का नाश होने में निमित्त है । अतः यह दोष मुनि स्वतः नहीं करे और दूसरों से न करावें और करने वालों को अनुमति न देवे, मन, वचन, काय से न करें, न करावें, न अनुमति . देवे 1 अर्थात् नौ प्रकार से प्रवः कर्म का त्याग करे | यह दोष छियालीस दोषों से अलग । और यह गृहस्थ का कर्तव्य है । सुनि को इस दोष से सर्वथा दूर रहना चाहिये, ग्रह दोष करने वाला मुनि गृहस्थ होता है । मुनिपता का नाशक यह दोष है । मुनियों को घटका जीव वध का स्याग ही होता है, अतः मुनि हंस दोष से सर्वथा दूर रहते ही हैं। फिर इसका यहां क्यों न किया है। अन्य पाखंड साधु यह दोष पाया जाता है। वे ऐसा प्राविध युक्त बाहार बनाते हैं, वैसा जैन मुनि नहीं करे। अन्य साधु ऐसा श्राहार बनाते हैं, अतः वे गृहस्थ हैं । जैन मुनि निष्परिग्रही है । उनको यह दोष निषिद्ध है ।