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श्रध्याय: पांचवां ]
उद्गम दोषों के सोलह भेद हैं । उनमें से पहिला श्रौशिक दोष है-देवदपाins किवि चावि जंतु उद्दिसि ।
कदम समुछे चदुविहं वा समासे ।।७०३
अधः कर्म महादोष है । उसके अनंतर प्रादेशिक दोष है । यद्यपि वह सूक्ष्म दोष है तो भी उसका त्याग करना चाहिये । देवता-नाग यक्षादिकों को देवता कहते हैं । पाखंडि जैन दर्शन से वाह्य मिथ्यादृष्टि कुतप करने वाले परिवाजक वगैरह साधु । कृपण-दीन लोक । देवताओं के लिये, पाखंडी साधुओं के लिए, दीन जनों के लिये जो श्राहार तैयार किया जाता है, उसे औशिक आहार कहते हैं । अर्थात् शिक दोष के संक्षेप से चार भेद हैं ।
शिक दोष के चार भेदों का स्वरूप --
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जावदियं उद्द सो पाडोति य हवे समुद्दे सो |
समणोति य श्रादेसो खिगंधोलि य हवे समादेसो ||७०४ ||
यावानुद्देश - जो कोई मागे उन सबको मैं भोजन देऊंगा ऐसा उद्देशसंकल्प मन में करके जो भोजन बनाया जाता है, उसको यात्रानुद्देश कहते हैं । जो कोई पाखंडी आयेंगे उन सबको आहार देऊंगा, ऐसे उद्देश से बनाये गये अन्न को पाखंडी समुद्देश कहते हैं । जो कोई श्रवगा, श्राजीवक, तापस, रक्तपट, परिव्राजक और छात्र शिष्य यावगे उन सबको मैं आहार देऊंगा ऐसे संकल्प से बनाये हुए अन्न को श्रमादेश यह संज्ञा है । जो कोई निर्बंध मुनि श्रावेगे उनको मैं ग्राहार देऊंगा ऐसे उद्देश से न किया जाता है, उसको निग्रंथ समादेश कहते हैं । तात्पर्य सामान्य के उद्देश्य से, पाखंडियों के उद्देश्य से, श्रमणों के उद्देश्य कर और निर्ग्रथों के उद्देश्य कर जो ग्रन्न बनाना वह चार प्रकार का प्रौद्देशिक दोष होता है । उद्देश से बनवाये आहार को प्रदेशिक प्रहार कहना चाहिये । अध्यधि दोष का स्वरूप-
जल तंदुलक्खेवो चारपट संजदारण सपथ |
भोज्यं यं श्रहवा पागं तु जाव
रोहो वा ॥१७०५॥ -
अपने लिये जो अल पकाया जाता है। उसी में संयत को देखकर उसके लिये भी जो पानी और तंदुलादिकों का पुनः अधिक क्षेपण करना उसको अध्यधि दोष. कहते हैं अथवा जितने काल में प्राहार तैयार होगा उतने काल तक प्रहार के लिये