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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
प्राये हुए मुनिराज की पूजा के लिये और धर्मप्रश्न आदि के निमित्त स्थापन करना वह भी दोष है ।
प्रति दोष का स्वरूप ---
reater frei पासुदव्वं तु पूदि कम्मं तं ।
चुल्ली उक्खलि दव्वी भायसगंधति पंचविहं ॥ ७०६ ॥
प्रासुक ऐसा भी अन्न श्रप्रामुक सच्चित्तादिक ग्रन्न के साथ मिश्रण करने से पूलि दोष उत्पन्न होता है । अथवा प्रागुक होने पर भी जिसमें संकल्प किया जाता है, उसको भी पूतिकर्म दोष पांच प्रकार का है। जैसे- चुल्लि जिस पर ग्रन्न पकाया जाता है, ऐसी सेगडी अथवा चूल । उनखलि जिसमें चटणी आदि कूटकर किये जाते हैं | द संडासी | भाजन प्रान्त पकाने का पात्र | गंध-गंध युक्त द्रव्य । चूल के ऊपर भात यादि पकाकर साबुको प्रथम देंगे नंतर स्वतः अथवा इतर लोगों को देऊंगा ऐसी कल्पना से प्राशुक भी द्रव्य पूतिकर्म से निष्पन्न होने से पूति कहा जाता है । उद्खल - इस उखली में चुर्ण कर जब तक वह ऋषियों को नहीं देऊंगा तब तक स्वतः के लिये अथवा अन्य के लिये वह उपयोग में नहीं लाऊंगा ऐसी कल्पना से यह उदुखली नामक पूतिकर्म दोष है । यद्यपि वह चूर्गा प्रसुक है तो भी उपर्युक्त संकल्पना से पूर्ति कर्म होता है । दर्वी संडासी से जब तक मुनि को आहार मैं कहीं दूंगा तब तक स्वः को अथवा अन्य को वह योग्य नहीं है ऐसे संकल्प से यह भी पूतिकर्म दोष है । गंध - यह मंत्र जब तक ऋषि को भोजन पूर्वक नहीं दूंगा तब तक ग्रन्थों को नहीं दूंगा । ऐसे संकल्प से यह भी पूतिकर्म दोष होता है। इस प्रकार पूतिकर्म दोष पाँच प्रकार का है । दाता उपर्युक्त संकल्प करके चुल्ली वगैरह से प्रथम प्रारम्भ कर्म करता है, यतः ऐसे आहार को यदि छोड़े देते हैं। यद्यपि इसमें आहार के ग्रन्नादिक पदार्थ प्रासुक हैं तो भी दाता के उपर्युक्त संकल्प से सदोष हैं, ऐसा समझाना चाहिये ।
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मिश्रदोष के स्वरूप का निरूपण.....
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पासंडेहि य सद्धं सागारेहिय जदण्समुद्दिसियं ।
दादुमिदि संजदाणं सिद्ध मिस्सं विद्यााहि २१७०७ ।।
प्रासु अन्न तैयार होने पर भी अर्थात् भात यादि अन्न प्रासुक होने पर भी पाखंडियों के साथ और गृहस्थों के साथ मुनियों को जो देने का संकल्प किया