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________________ अध्याय : पांचवां ] जाता है, तब वह अन्न मिश्र दोष से युक्त होता है । पाखंडियों के साथ मुनियों को आहार देने से और गृहस्थों के साथ उनको आहार देने से मुनियों का यथा योन्य प्रादर नहीं हो सकता, अत: इस प्रकार के ग्राहार दान में अनादर दोषं उत्पन्न होता है । तथा पाखंडियों के साथ मुनियों के दान में स्पर्शदोष उत्पन्न होता है, क्योंकि पाखंडी चाहे जहां उनन्द्र मीच लोगों के नरसाहारते हैं : .तथा पाखंडी स्वतः उच्च और नीच जाति के भी होते हैं, अतः इनके साथ मुनियों को बाहार देने से स्पर्श दोष भी उत्पन्न होता है। स्थापित दोष का स्वरूप--- पागाद् भायपाश्री अण्णम्हि य भायणस्मि पक्वविय। सघरे व परघरे वा रिपहिवं विदं वियागाहि १७०८३.. जिस स्थाली में आहार पकाया था, उसमें से बह आहार निकाल कर अन्य स्थाली में-पात्र में वह स्थापना करके स्वगृह में अथवा परगृह में ले जाकर स्थापन करना वह स्थापित दोष है। दाता में भय होने से यह आहार के पदार्थ अन्य भाजन में रखकर अपने अथवा दूसरे के घर में रखकर दान देता है नथवा उसके साथ. उसके स्थजनों का विरोध होने से वह अन्य के घर में आहार के पदार्थ रखता है, अतः ग्रह दान भय और विरोधादि दोषों से दूपित होता है ।। बलिदोष का स्वरूप---- जक्खयणागादोरणं बलिसेसं बलित्ति पणतं । संजद प्रागमणटै बलियम्म वा बलि जाणे ॥७०६॥ यक्ष, नाग, मातृका, कुलदेवता, पितर आदि के लिए जो बलि किया जाता है, उसमें से बचा हुआ जो बलि का अंग्ण वह मुनि के लिए भी उपयोग में लाना, यह वलि दोष है । अथवा नागयज्ञादि के लिये जो बंदनादिक उपयोग में लाकर अवशिष्ट रहे थे, उनका मुनियों के पूजा में भी उपयोग करना यह वलिदोष है, किंवा मुनियों को स्थापन कर चन्दनादिक अर्पण करना, उदक क्षेपण करना, पुष्पफल पत्रादिक तोड़कर उससे अर्चन करना यह सावद्य दोष से युक्त होने से दोष मुक्त माना प्राभत दोष के स्वरूप का निरूपण 'पाहुडियं पुरण दुविहं बादर सुहमं च दुधिहमेक्केवकं । सोकस्सरण मुक्कस्सरण महकालो वट्ट पावड्ढी ॥७१०।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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