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________________ ३२२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि प्राभूत दोष के बादर और सूक्ष्म से दो भेद हैं। पुनः बाहर के उत्कर्षगर और अपकर्षण ऐसे दो भेद हैं। सूक्ष्म के भी उत्कर्धरण और अपकर्ष ऐसे दो-दो भेद होते हैं । बादर के दो भेद और सूक्ष्म के दो भेद--- दिवसे पक्खे मासे वास परत्तीय बादरं दुविहं । पुव परमज्भवेलं परियत दुविह सुहुमं च ॥७११॥ ठहाया हुआ-निश्चित किया हुआ दिवस, पक्ष, महिना और वर्ष को बदलकर जो दान दिया जाता है, वह बादर प्रामृतकदोप से दूषित होला है । यह . बादर प्राभृतकदोप दो प्रकार का है। उसका खुलासा-शुक्लाष्टमी के दिन देने के लिए निश्चित किया आहार, दिन कम करके शुक्लपंचमी के दिन देना। और शुक्ल पंचमी के दिन आहार देने का निश्चय बदलकर शुक्लाष्टमी को याहार देना । यह दिवस परावृत्ति-प्राभृतकदोष है । चैत्र शुक्ल पक्ष में देने का निश्चय बदलकर चैत्र कृष्ण पक्ष में देना और चैत्र छग में देने का निश्चय बदलकर चैत्र शुअल में देना । चत्र मास में याहार देने का निश्चय बदलकर फाल्गुन में देना और फाल्गुन का आहार देने का निश्चय बदलकर 'चैत्र मास में ग्राहार देना यह पासपरावृत्ति- ।। प्राभुतकदोग है । आगे के वर्ष में देने का निश्चय बदलकर अब के वर्ष में दान देना : तथा सांप्रतिक वर्ष का निश्चय बदलकर उत्तरवर्ष में आहार देना निश्चित करना इस . प्रकार बादर प्राभूत के दो भेदों का वर्णन किया है ! सूक्ष्म प्राभूत के दो भेद इस प्रकार समझना चाहिए-दिन के पूर्व काल में आहार देने का निश्चय बदलकर मध्यान्हकाल में देना, मध्यान्हकाल का निश्चय बदलकर पूर्वान्हकाल में देना । इस प्रकार काल को हानि और वृद्धि के आश्रय से प्राभतक दोष के दो भेद कहे हैं। संबलेश परिणाम और आरम्भ दोष इनमें दीखता हैं, अतः ये दोष दाता के द्वारा त्याज्य हैं। प्रादुष्कार दोष का वर्णन पादुक्कारो दुविहो संकमणपघासणा च बोद्धव्यो । भायरए भोयण दीरए मंडल - बिरलादियं कमसो ॥७१२।। . प्रादुष्कार दोष के संक्रमग्य और प्रकाशन ऐसे दो भेद हैं। संक्रमण प्रादुष्कार दोष--भोजन और भोजन के पात्र एक स्थान से स्थानांतर में ले जाना । ' "...... . .... . ..AARAKSE SM
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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