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अध्याय : पांचवां ]
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प्रकाशन प्रादुष्कार-याहार के उपयुक्त पात्र भस्मादिक से मांदना धोना श्रथवा श्राहार. उपयुक्त पात्र फैल कर रख देना । छत चन्द्रोपक वगैरह ऊपर लगा देना, भीत और जमीन गोवर और मिट्टी से लेपना, साफ सुथरी करना, दीपक जलाना इत्यादिक कार्य करना प्रादुष्कार दोष का स्वरूप है। ये कार्य करते समय ईशुद्धि नहीं रहती है, ग्रतः यह दोष उत्पन्न होता है । एक स्थान से अन्य स्थान में आहारादिक के पात्र ले जाते समय ईयपथशुद्धि का पालन करना चाहिए। वह न होने से प्रादुष्कार दोप उत्पन्न होता है ।
क्रीततर दोष का स्वरूप
कीदयर्ड पुण दुहिं दव्वं भावं व सग परं बुविहं । सच्चित्तादी दव्वं विज्जामंतानि भाव च ॥७१३॥ क्रीततर के द्रव्य और भाव ऐसे दो भेद हैं । द्रव्य के भी स्वद्रव्य और परद्रव्य ऐसे दो भेद हैं। भाव के स्वभाव और परभाव ऐसे दो भेद हैं। गाय, भैंस, ara इत्यादि को द्रव्य कहते हैं । विद्या मन्त्रादि को भाव कहते हैं । गाय, भैंस, ग्रश्व आदि को सचित्तद्रव्य कहते हैं और तांबूल वस्त्रादिकों को अचित द्रव्य कहते हैं । जब मुनि आहार के लिए श्रावक के घर में जाते हैं उस समय श्रावक अपना अथवा अन्य का सचित्तादि द्रव्य और तांबूल वस्त्रादिक अन्य श्रावक को देकर उससे बहार
कर यदि मुनिराज को आहार देगा तो क्रीत दोष उत्पन्न होता है । तथा स्वमंत्र अथवा परमंत्र, स्वविद्या अथवा परविद्या देकर प्रहार प्राप्ति कर लेता है और यति को वह प्रहार यदि श्रावक देगा तो यह भी क्रीतदोष कहा जाता है । प्रज्ञयादिकों को विद्या कहते हैं और चेटक आदि को मंत्र कहते हैं । इनके द्वारा प्रहार उत्पन्न करके मुनि को शाहार देने में कारुण्यदीप उत्पन्न होता है, संक्लेश परिणाम भी उत्पन्न होते हैं ।
ऋण दोष का स्वरूप
हरियरिणं तु भरियं पामिच्छे प्रदरणादि तं पुरण दुविहं भणिदं सवाढियमवड्ढियं लघु ऋण को 'दहरिय' कहते हैं । भात वगैरह है । यह ऋण और अन्नादिक वृद्धि सहित और वृद्धि रहित ऐसे दो प्रकार के हैं । इनका स्पष्टीकरण इस प्रकार से समझना जब मुनि बाहार के लिए जाते हैं । तब
अन्न को पामिच्छा कहते
पदरं ।
चापि ॥७१४॥