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[ गो. प्र. चिन्तामणि
दाता अन्य श्रावक के घर में जाकर प्रनादिक की याचना करता है, अर्थात् मेरे घर पर मुनि ग्रहार के लिए श्रायें हैं, यदि इस समय आप मेरे को अन्नादिक देंगे तो मैं आपको उससे अधिक प्रथवा उतने ही यन्नादिक बस्तु दूंगा, इस प्रकार कहकर उनसे अन्नादिक लेकर मुनि को देना यह प्रामृप्यदोप है। इस प्रकार से आहार देने में दाता के परिणामों की निर्मलता नहीं रहती है और आहार लेने के लिए अनेक घरों में जाने के कष्ट भी होते हैं, अतः इस प्रकार से आहार देना सदीप माना है। ऋण लेकर दान देना यह दोष है ।
परावर्त दोष का स्वरूप
वीही करावीहि य सालीकूरादियं तु जं गहिदं ।
दादुमिदि संजदारणं परिय होवि खापव्वं ॥ १७१५।।
अन्य श्रावकों के पास जाकर व्रीहियों के भात वगैरह पदार्थ देकर उनसे शाल्योदनादि पदार्थ लेकर मुनियों को ग्राहार देना यह परिवर्तन नामक दोष है । अथवा मंडकादिक पदार्थ देकर व्रीहिनों का भात वगैरह उनसे लेना यह परिवर्तन दोष है । इसमें दाता को संक्लेश परिणाम उत्पन्न होते हैं, अतः यह दोष है ।
अभिघट दोष का स्वरूप ---
देसोत्तिय सव्वति व दुविहं पुण अभिहडे वियाणाहि । श्रचिणमाचि देसाभिहडं हवे विदियं ॥७१६ ॥
देशाभिट और सर्वाभिघट ऐसे ग्रभिघट दोष के दो भेद हैं। किसी एक प्रदेश से आये हुए भात आदिक पदार्थ को देशा भिघट कहते हैं । अनेक स्थानों से प्राये हुए भात यादि पदार्थ को सर्वाभिट कहते हैं। देशाभिट के श्राचिन्नं देशाभिघट श्री अनाचिन्न देशाभिघट ऐसे दो भेद हैं।
श्राचिश और अनाचिन्न का स्वरूप ---
उज्जु तिहि सतह वा घरेहि जदि श्रागर्द दु श्राचिष्णं ।
परदो वा तेहि भवे तव्चिवरीवं प्रणाचिणं ॥ ७१७॥
सरल पंक्ति स्वरूप तीन अथवा सात घरों से प्राये हुए भात, लड्डू श्रादिक यन्न को प्राचिन्न कहते हैं । ऐसा अन्न मुनियों के ग्रहण योग्य माना है । उसमें दोप नहीं है । परन्तु जो एक पंक्ति में नहीं है, ऐसे घरों में से अन्नादिक लाते समय शुद्धि नहीं होती हैं । श्रतः प्रक्रमपत्तिस्थित घरों से आया हुआ याहार मुनियों