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अध्याय : पांचवां }
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को निषिद्ध है। सर्वाभिघट दोष का स्वरूप ---
लब्बाभिघडं चदुधा सयपरगामे सदेस परदेसे। पुब्धापर पाडण यर्ड पढम सेसं पिरणादब्धं ॥११॥
सर्वाभिघट के स्वग्राम, परग्राम, स्वदेशे और पर ऐसे चार भेद हैं । जिस ग्राम में मुनि तिण्ठे हैं, वह स्वग्राम है। उससे भिन्न ग्राम को पराम कहते हैं । जिस देश में मुनि स्थित है, वह स्वदेश है और उसमे अन्य दंश को परदेश कहते हैं । स्वग्राम से पाये हुए अन्नादिक को स्वग्रामाभिघट दोष कहते हैं। स्वग्राम से पाये हए अनादिक को ग्रहण न करे। इसका स्पष्टोकरण-एक गली में से दूसरे गली में अन्नादिक को ले जाना, पूर्व की गली में से पश्चिम दिशा की गली में अन्नादिकले जाना, यह स्वग्रामाभिघट नामक दोष है। दूसरे ग्राम से अपने ग्राम को अन्नादिक लाना परनामाभिघट नाम का दोष है । अपने देश से अपने ग्राम को अन्नादिक लाना परनामाभिवट नाम का दोष है। अपने देश से अपने ग्राम को अन्नादिक लाना, यह परदेशाभिघट नामक दोष है। ऐसे सर्वाभिघट दोष के चार भेद हैं। इसमें दूर से अन्नादिक लाने से ईर्यापथ शुद्धि नहीं रहती है, अतः इस सर्वाभिवट दोष को त्यागना चाहिये। उभिन्न दोष का वर्णन---
पिहिवं लछिदियं वा प्रोसहाधिवसकरादि दव्वं । उभिदिऊरण देयं उविभाणं होदि रणादववं ॥७१६॥
ढक्कन से बंद किये हए अथवा कीचड़ से लिप्त किंवा लाख से मुद्रित ऐसे पात्रों में रखे हुए जो औपध, घी, गुड़, शवकर, लड्डू, खजूर, आदिक पदार्थ ढक्कन खोलकर बा मुहर तोड़कर यति को देना वह उभिन्न नामक दोष है । ढके हुए पात्रों
में चीटी प्रादिक जन्तु प्रवेश करते हैं और उस पात्र में से गुड़, खांड वगैरह पदार्थ __मनियों को देते समय चींटी प्रादिकों की बाधा होती है, अतः इस प्रकार का ग्राहार.
उभिन्नदोष से दूषित है। मालारोहण दोष का वर्णन
हिस्सेरणी कहादिहि रिणहिदं पूयादियं तु घेत्तूरग। मालारोह किच्चा देयं मालारोहण साम ।।७२०॥
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