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[ गो. प्र. चिन्तामणि निसनी से चढ़कर घर के दूसरे मजले में-माडी रबखे हुए मंडक, लड्डू यादिक पदार्थ को लेकर मुनियों को देना, यह मालारोह नामक दोष है। निसैनी के द्वारा माड़ी पर से लड्ड आदिक पदार्थ लाने वाला दाता नीचे गिरकर पड़ने की संभावना है, दाता को अपाय होने की इसमें संभावना होती है, अतः यह दोष .. स्थाज्य हैं। अच्छेचदोष का स्वरूप
राजाचोरादीहि य संजद भिक्खा समं तु दरग । बीहेदूरण गिजुज्ज · अच्छेज्जं होदि गाददं ॥७२१॥
मुनियों को भिक्षा का कष्ट होता है, ऐसा समझकर राजा तथा राजा के समान अधिकारी व्यक्ति और चौरादिक श्रावकों को भय दिखा कर उनसे मुनियों को पाहार दिलाते हैं, इस प्रकार पाहार देना ग्रह आच्छेय नामक दोष है । राजादिक श्रावकों को इस प्रकार कहते हैं---तुम यदि यतियों को ग्राहार न देंगे तो तुम्हारा धन हम लूटेंगे, गांव से निकाल दंगे. इस प्रकार डराकर के जो दान दिया जाता है; .. बह पाच्छेद्य नामक दोग है। अनीशार्थ दोष के स्वरूप का विवरण
अरिगस8 पुरण. दुविहं इस्सरमहरिपस्सरं च तिवियप्पं । पढमिस्सरसारखं वत्तावत्तं व संधाडं ॥७२२॥
अनीशार्थ- प्रधान हेतु को अनीशार्थ कहने हैं, वह अनीशार्थ ईश्वर और अनीश्वर ऐसा दो प्रकार का है। अथवा धनेश्वर ऐसा पाठ है । जिस अन्न लड्डू ... ग्रादिक पदार्थ के अप्रधान अर्थ कारण है, उन लड्डू 'आदिक पदार्थों को अनीशार्थ कहते हैं। ऐसे पदार्थ को ग्रहण करने में जो दोष होता है, उस दोष को भी अनीशार्थ - कहते हैं । इस अनोशार्थ के ईश्वर और अनीश्वर ऐसे दो भेद हैं ।
. सारक्षईश्वर, यह दान का पहला भेद है 1 अमात्य पुरोहितादिकों को प्रारक्ष कहते हैं, अारक्षों से सहित दान देने वाले ईश्वर को सारक्षईश्वर कहते हैं । इसका
अभिप्राय-दाता के मन में मुनि को दान देने की इच्छा है तो भी वह नहीं दे सकता .. . है, क्योंकि दूसरे लोग देते समय उससे विरोध करते हैं । अर्थात् दाता को दान देता
है, परन्तु अमात्य पुरोहिताविक विरोध करते हैं, इस प्रकार से यदि उस दाता का . दिया हुया अन्न लेंगे तो यह पहला ईश्वर नामक अनीशार्थ दोष है ।