________________
ཚད་གསུམ་གྱི་ས་བབ་དང་རྒྱ་བས་ལག་ལ་བབ་པ་ཕྱིས་སུ་
KA
अध्याय : पांचवां ]
[ ३२७ अनीशार्थ --- जिस दान का अप्रवान पुरुप हेतु होता हैं, वह दान अनीशार्थ कहा जाता है । और ऐसे दान से उत्पन्न हुए. दोष को भी अनीशार्थ कहते हैं । यहाँ कार्य में कारण का उपचार किया है । दान ग्रहण करना यह कारण है और उससे उत्पन्न हुआ दोष कार्य माना जाता है। कार्य रूप दोष को कारण का नाम देने से कार्य में कारगा का उपचार हुअा है। .
___ यह अनीशार्थ तीन प्रकार का है---व्यक्त, अव्यक्त और संघाटक । अनीश्वर दानादिक का स्वामी नहीं माना जाता है। परन्तु व्यक्त-बुद्धी से, विवेक से कार्य करने वाले अनीश्वर को व्यक्तानीश्वर कहते हैं। ऐसे अनीश्वर के द्वारा दिया जाने चाला पाहार यदि मुनि ग्रहण करेंगे, तो यह व्यक्त अनीश्वर, अनीशार्थ नामक दोष होता है।
अव्यक्त अनीश्वर अतीशार्थ ----पानीश्वर दान का स्वामी नहीं माना जाता है, यह ऊपर कह चुके हैं । अव्यक्त:---जो अविवेक से कार्य करता है, ऐसे अनीशने दिया हुया अन्न ग्रहण करना वह अन्यक्त अनीश्वर नामक अनीशार्थं दोष है । ...
व्यक्ताव्यक्त अनीश्वर नामक अनीशार्थ दोष..इसकी ही संघाटक अनीश्वर नामक अनीशार्थ दोष ऐसा दूसरा नाम है | व्यक्त और अव्यक्त ऐसे अनीश्वर के द्वारा दिया जाने वाला पाहार साधु यदि ग्रहण करें तो यह दोष होता है । ऐसा आहार लेना अपायकारक है। अथवा इस दोष का स्पष्टीकरण इस प्रकार से भी होता है । ईश्वर-दान देने वाला अर्थात् दानपति स्वामी । व्यक्ताव्यक्त दानपति के द्वारा जिसका निषेध किया है, ऐसा दान यदि साधु ग्रहण करेंगे, तो बह व्यक्ताव्यक्तेश्वर नामक अनीशार्थ दोष होता है।
व्यक्ताव्यक्तेश्वर नामक अनीशार्थ दोष-जो दान का स्वामी नहीं है ऐसे अक्ताव्यक्त के द्वारा दिया हुआ जो दान मुनि ग्रहण करते हैं, तब यह दोष उत्पन्न होता है।
संघाटक-समुदाय -अर्थात् कोई पुरुष दान का निषेध करता है और कोई दान देता है । इस प्रकार का दान साधु ग्रहण करेंगे तो यह संघाटक नामानीशार्थ दोष है।
... ईश्वर व्यक्ताध्यक्त, संघाटभेद से दो प्रकार का है 1 ईश्वर-दान का स्वामी ग्राहार देने के लिये उद्य बत हुआ है और ईश्वर ही व्यक्ता, अव्यक्त, संघाट के द्वारा
..:"::":..
:
।
: