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________________ [ गो. प्र. चिन्तामि ३२८ ] जब दान का निषेध करता है तब यह दोष उत्पन्न होता है । गाथा में जो 'च' शब्द है वह समुच्चयार्थक है उसका स्पष्टीकरण - ईश्वर दो प्रकार का है और अनीश्वार भी दो प्रकार का है। ईश्वर दानपति दान देता है और व्यक्त, अव्यक्त ऐसे अनीश उसका निषेध करता है । अथवा व्यक्त किंवा व्यक्त ईश्वर के द्वारा निषिद्ध दान को ग्रहण करना ऐसे दो भेद ईश्वरानीशार्थ के हैं। तथा व्यस्त और अव्यक्त अनीश के द्वारा निपिद्ध दान ग्रहण करना ये दो भेद धनीश्वर अनीशार्थ के होते हैं । संघटक के द्वारा निषिद्ध किया हुआ दान ग्रहण करना यह भी उपर्युक्त दोषों से भिन्न दोष है, क्योंकि इसमें सर्वत्र निषेध ही दिख पड़ता है । अथवा निसृष्ट शब्द का - मुक्त ऐसा अर्थ है अर्थात् जो निषेधा जाता है उसको निसृष्ट कहते हैं । जिसकी मनाई की गई है वह अनिसृष्ट है । अनिसृष्टं के ईश्वर और अनीश्वर ऐसे दो भेद हैं । पुनः चार भेद इस प्रकार होते हैं --- ईश्वर के सारक्ष, व्यक्त, अव्यक्त और संघाटक ऐसे चार भेद हैं। मंत्र्यादियुक्त स्वामी को सारक्ष कहते हैं । वालक स्वामी को अव्यक्त कहते हैं । प्रेक्षापूर्वकारी विवेकी स्वामी को व्यक्त कहते हैं । व्यक्ताव्यवत का समूह संघाटक कहा जाता है। इस प्रकार अनीश्वर के भी भेद हैं। इन्होंने निषेधा हुआ ग्रथवा दिया हुआ दान यदि साधु लेंगे तो प्रनिसृष्ट दोष होता है । इस प्रकार अनिसृष्ट दोप का विवरण हुआ । उत्पादन दोषों का प्रतिपावन धादोदरिणमते प्राजीते वरिये य ते गिछे । कोघी मारी मायी लोही य हवंति दस एदे ||७२३| घादी - माता | दूत - वार्ताहर । निमित्त - ज्योतिष | आजीव-ग्राजीविका वनीपक-दाता के भनुकूल भाषण करना। चिकित्सा - वैद्य शास्त्र 1 क्रोधी, मानी, मायावी, लोभी इस प्रकार उत्पादन दोष के दस भेद हैं । goat पच्छा संयुदि विज्जामते य चुष्पजोगे छ । उत्पाद य दोसो सोलसमो मूलकम्मे य ३७२४।। पूर्व स्तुति-दान ग्रहण के पूर्व दाता की स्तुति करना । पश्चात्स्तुति-दान ग्रहण के पश्चात् दाता की स्तुति करना । विद्या प्राकाशगामिनी, रूपपरावर्तिनी, शास्त्र स्तंभिनि इत्यादि विद्याओं का माहात्म्य कहना | मंत्र - सर्प विषं, वृश्विकविस दूर करने वाले मंत्र के द्वारा अपना महत्व दिखाकर दाता से आहार ग्रहण करना ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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