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________________ अध्याय : पांचवां ] [ ३२० चूर्ण, योग- शरीर को सुगंधित और भूषित करने वाले उबटन ग्रादिकों का उपदेश करना ये सब उत्पादन दोष हैं । मूल कर्म- जो वश नहीं हैं, उनको वश करना ऐसे सोलह उत्पादन दोष हैं । धात्री दोष का विवरण ---- मज्जम मंडधावी खेल्लावरणवीर अंबधादी य । पंच विध धादिकम्मेपादो घादिदोसो दु ॥७३५॥ जो बालक का संरक्षरण करती है पोषण करती है, उसको दूध पिलाती है, उसको कहते हैं । धात्री के पांच भेद हैं। उनका विवेचन - मार्जनधात्री-जो बालक को स्नान करवाती है उसको मार्जनधात्री कहते हैं। जो बालक को तिलक, अंजन और ग्राभूषण से सजाती है उसको मंडन धात्री कहते हैं । जो बालक को क्रीडा के द्वारा ग्रानंदित करती है, उसको क्रीडन चात्री कहते हैं । जो बालक को दूध पिलाती है, स्तनपान कराती है वह क्षीर यात्री है । जो बालक को अपने पास सुलाती है वह अंब धात्री है | ऐसे पांच धात्रियों के कार्यों से जो मुनि गृहस्थ द्वारा प्रहार उत्पन्न कराते हैं उनको यह धात्री नामक उत्पादनं दोष होता है। बालक को इस प्रकार से यदि तुम स्नान करोगे तो वह सुखी और रोग रहित होगा ऐसा उपदेश मुनि गृहस्थ को देते हैं । जिससे गृहस्थ आनंदित होकर मुनि को चाहार देगा । इस प्रकार से मुनि लेंगे तो उनकी यह धात्री नामक दोष उत्पन्न होता है । भूषित करने का देता हैं मुनि उस जो मुनि स्वयं बालक को भूषित करते हैं तथा बालकों को का उपदेश गृहस्थ को देते हैं जिससे गृहस्थ खुश होकर उनको दान दान को यदि ग्रहण करेंगे तो उनको मंडन पात्री नामक उत्पादन दोष होगा, जो मुनि स्वयं क्रीडा सिखलाते है तथा बालक को क्रीडा के खुश रखने का उपदेश गृहस्थ को देते हैं और ऐसे उपदेश से आहार देने के लिये उक्त गृहस्थ का प्रहार जो लेते। हैं, उनको क्रीडन धात्री नामक उत्पादन दोष कहते हैं। जिससे दूध उत्पन्न होता है ऐसा उपाय कहना और योग्य उपाय से बालकों को दूध पिलाने का उपदेश देते है, तथा गृहस्थ संतुष्ट होकर मुनि को आहार देने के लिये प्रवृत्त होता है ।' तब वह आहार यदि मुनि लेंगे तो उनको क्षीर यात्री नामक दोष होता है, जो मुनि बालकों को सुलाने का उपाय बतलाते हैं, तब गृहस्थ संतुष्ट होकर उनको प्रहार देता है । उसको 1
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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