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________________ ३३० [ गो. प्र. चिन्तामणि ग्रहण करने वाला साधु संवधात्री नामक दोष से दूषित होता है । इन दोषों से स्वाध्याय का नाश होता है, श्रतः ये दोष त्यागने चाहिये । तीनामक दोष का विवरण -- जल थल प्रायासगदं समरगामे सदेस परदेसे । संबंधिary raणं दूदो दोसो हबदि एसो || ७२६ ॥ स्वग्राम से परग्राम को पानी में नाम के द्वारा साधु जा रहे हैं ऐसे समय कोई श्रावक मेरे संबंधी जनों को मेरा संदेश आप कहो ऐसा कहता है तब बहु साधु उसके संबंधी को वह संदेश वहाँ पहुँचाकर कह देता है । तब वह संबंधीजन आनंदित होकर - दानादिक दे और साधु यदि वह लेंगे तो वह शाहार दूतों दोष युक्त होता है । स्वदेश से परदेश को जल में नौका के द्वारा साधु जा रहे हैं तब कोई गृहस्थ अपनी बार्ता संबंधी जन के पास पहुँचाने के लिये कहते हैं साधु वह वार्ता कह देते हैं तब ह संबंधी संतुष्ट होकर आहारादिक देता है और साधु यदि ग्रहण करेंगे तो यह भी दूती दोष होता है । उपर्युक्त प्रकार से एक गांव से दूसरे गांव को, एक देश से दूसरे देश को स्थल से किंवा आकाश से जाते समय मुनि को कोई गृहस्थ संबंधीजन के लिये कोई संदेश पहुँचाने के लिये कह दे और वह साधु उसको कहने पर वह संतुष्ट होकर दानादिक देता है । तब ऐसे दानादिक लेने से साधु दूती दोष से युक्त होते हैं । गृहस्थों के संबंधीजनों के सन्धि संदेश ले जाना सुनियों के लिये योग्य नहीं है । ऐसा दूतकर्म शासन में दोष उत्पन्न करता है। निमित्त दोष का स्वरूप ---- सरं च वंजरग लक्खा चिण्णं च भोम्मलुमिणं च । तह व अंतरिक्खं प्रविहं होइ मितं ।।७२७॥१ अंग-हाथ पांव ग्रादिक शरीर के श्रवयव । स्वर-शब्द | व्यंजन तिल, मशकाfor चिह्न | लक्षण हस्ततलादिकों पर नन्दिक, आवर्त, पद्म, चक्रादिक प्राकृति | छिन्न-छेद खङ्गादि प्रहार प्रथवा चूहा आदि प्राणियों के द्वारा किये गये वस्त्रादि के छेदों को छिन्न कहते हैं। भूमि विभागों को भौम कहते हैं । सूर्य चन्द्रादिग्रहों के उदयास्त और गति को अंतरिक्ष कहते हैं । स्वप्न-निद्रित प्राणियों का हाथी, विमान aff पर आरोहण देखना ऐसे ग्राठ प्रकार का निमित्त है । व्यंजन- शरीर के ऊपर तिलादिक देखकर उनसे होनहार शुभाशुभ जाना
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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