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श्राध्याय : पांचवां ।
[ ३३१ जाता है उसे व्यंजन निमित्त कहते हैं 1 अंग मस्तक, कंठ आदि अवयवों को देखकर पुरुष के शुभाशुभ जान लेना यह अंग निमित्त है । स्वर-शब्द मुनकर मनुष्य अथवा अन्य प्राणियों का शुभाशुभ जानना स्वरनिमित्त है । छेद-प्रहार अथवा वस्त्रादिक में छेद देखकर किसी पुरुष या अन्य का शुभाशुभ जानना भूमि निमित्त है । अन्तरिक्ष अाकाश में ग्रहों का युद्ध, अस्त, वजापात, उल्का पतन, नक्षत्र कंप इत्यादि देखकर राजा प्रजादिकों का शुभाशुभ जान लेना अन्तरिक्ष निमित्त है । लक्षगा-पुरुष अथवा नारी के लक्षण देखकर उनके शुभाशुभ कह देना लक्षण निमित्त है। स्वप्न को देखकर पुरुप अथवा अन्य का शुभाशुभ जानना वह स्वप्तनिमित्त है । 'गाथा में त्र' शब्द है उससे भूमिगर्जना, दिग्दाह इत्यादिकों का ग्रहण होता है इन निमित्तों से आहार उत्पन्न कराकर यदि मुनि श्राहार लेगा तो उसको निमित्त नामक उत्पादन दोष होता है । रसलपटता, दीनता वगैरह दोष इस प्रकार से प्राहार लेने में व्यक्त होते
साजीव दोष का निरूपण---
‘जादोकुल सि तवकम्म इसरत श्राजीवं । तेहि पुरण उत्पादो प्राजीव दोसो हदि एसो ॥७२८।।
जाति-माता के पीढियों की परंपरा अथवा माता के शीलादि गणों की निर्मलता । कुल-पिता के वंश की परम्परा अथवा पिता ग्रादिक पूर्वजों की सदाचार तत्परता । शिल्पकर्म-लेप, चित्र प्राधिक हस्तकला का चातुर्य । तपःकर्म-तपोऽनुष्ठान । ईश्वरत्व समाज में पादरणीयता, धनाढ्यपना । अपनी जाति और कुल का वर्णन सुना करके दाता को प्रसन्न करना और उसने दिया हुअा अाहार लेना यह प्राजीव दोष है। इस ही प्रकार से अपना कला चातुर्य, अपना तपश्चरण अादि वर्गन करके दाता के मन में स्वविषयक आदर उत्पन्न करने से वह पाहार देने में प्रवृत्त होने पर उससे आहारादिक लेना यह ग्राजीवक दोष है। इस प्रकार आहार लेने से अपना सामर्थ्य और दीनतादिक दोष प्रकट होते हैं। बनीपक वचन नामक दोष का निरूपण-----
साग किवण तिथि साहण पासडिय सवरएकागदाणादि ।
पुण्णं णवेति पुढे पुणेति वरणीवयं : वयणं ।।७२६।। :: कुत्ते, दोन कुष्ठादि रोग से पीड़ित जन, मध्याह्नकाल में आये हुए भिक्षुक ...