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[गो. प्र. चिन्तामगि ब्राह्मण, मासादिक कामना करने की जोग, श्रमा-गाजीवक नाम के साधु अथवा छात्र-विद्यार्थी, काम वगैरह पक्षी, इनको दानादिकं देने से पुण्य प्राप्ति होती है अथवा नहीं होती है ? ऐसा प्रश्न पुछने पर दाता के अनुकूल यदि 'पुण्य होगा' ऐसा बचन साधु बोलेंगे तो बनीपकवचन नामक दोष होता है । दानगति के अनुकुल वचन बोलकर यदि जैन मुनि याहार लेंगे तो वनीपक नामक उत्पादन दोप उत्पन्न होता है । इसमें भी दीनतादिक दीख पड़ते हैं, अतः यह दोष त्याज्य है। चिकित्सा दोष का निरूपण
'कोमारतणुलिगिछारसायणविसभूद खारतंतं च ।
सल्लं सालकियणं निगिच्छदोसो दु अट्टविहो ॥७३०।।
कौमार-बालवैद्य शास्त्र अर्थात् मासिक, सांवत्सरिक पीडा देने वाले ग्रहों का निराकरण करने के उपाय बताने वाले शास्त्र को कौमार शास्त्र कहते हैं । तनुचिकित्सा ज्वरादि रोगों का नाश करने का उपाय दिखाने वाला शास्त्र अथवा कंठ, पेट आदिकों का शोधन करने वाला शास्त्र । रसायन-शरीर के वलि और वृद्धत्व को दूर करने वाली वस्तु को रसायन कहते हैं। रसायन के सेवन से दीर्घ काल तक जीवनावस्था प्राप्त होती है । विष-स्थावरबिध और जंगमविष ऐसे विष के दो भेद हैं । तथा कृत्रिम विद और अकृत्रिम बिष ऐसे भी विष के भेद है । इनसे होने वाली बाधा दूर करना । भूत चिकित्सा-पिशाच को निकालने वाला शास्त्र । क्षारतंत्र-दुष्ट वरण को शोधन करने बाले द्रव्य । शालाकिक-शलाका से नेत्र के ऊपर पाये हुए पटल. को हटाकर मोती बिंदु बगैरह नेत्र रोग को दूर करने वाला शास्त्र । शल्य-भूमिशल्य और शरीर शल्य ऐसे शल्य के दो भेद हैं, तोमरादिकों को शरीर शल्य कहते हैं और हड्डी आदि . को भूमि पाल्य कहते हैं । उसको निकालने वाले शास्त्र को शल्य चिकित्सा कहते हैं। विष दूर करने वाले शास्त्र को 'विष' कहते हैं। भूत-पिशाच हटाने वाले शास्त्र को भूत शास्त्र कहते हैं । यहाँ कार्य कारणोपचार किया है । अथवा चिकित्सा शब्द प्रत्येक के साथ-कौमार, तनु, भूत इत्यादिकों के आगे जोड़ना चाहिये । जैसे कौमार चिकित्सा तनूचिकित्सा, भूतचिकित्सा इत्यादि । जैसे कौवे की प्रांख की तारिका दोनों तरफ घूमती हैं वैसे कौमारादि शब्दों के प्रागे चिकित्सा शब्द जोड़ना चाहिय । जो मुनि उपयुक्त पाठ प्रकार के चिकित्सा शास्त्र के द्वारा थावकों पर उपकार कर उन्होंने दिया हुया आहार लेता है, तब उसको पाठ प्रकार का चिकित्सा का दोष उत्पन्न होता