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________________ ३३२ ] [गो. प्र. चिन्तामगि ब्राह्मण, मासादिक कामना करने की जोग, श्रमा-गाजीवक नाम के साधु अथवा छात्र-विद्यार्थी, काम वगैरह पक्षी, इनको दानादिकं देने से पुण्य प्राप्ति होती है अथवा नहीं होती है ? ऐसा प्रश्न पुछने पर दाता के अनुकूल यदि 'पुण्य होगा' ऐसा बचन साधु बोलेंगे तो बनीपकवचन नामक दोष होता है । दानगति के अनुकुल वचन बोलकर यदि जैन मुनि याहार लेंगे तो वनीपक नामक उत्पादन दोप उत्पन्न होता है । इसमें भी दीनतादिक दीख पड़ते हैं, अतः यह दोष त्याज्य है। चिकित्सा दोष का निरूपण 'कोमारतणुलिगिछारसायणविसभूद खारतंतं च । सल्लं सालकियणं निगिच्छदोसो दु अट्टविहो ॥७३०।। कौमार-बालवैद्य शास्त्र अर्थात् मासिक, सांवत्सरिक पीडा देने वाले ग्रहों का निराकरण करने के उपाय बताने वाले शास्त्र को कौमार शास्त्र कहते हैं । तनुचिकित्सा ज्वरादि रोगों का नाश करने का उपाय दिखाने वाला शास्त्र अथवा कंठ, पेट आदिकों का शोधन करने वाला शास्त्र । रसायन-शरीर के वलि और वृद्धत्व को दूर करने वाली वस्तु को रसायन कहते हैं। रसायन के सेवन से दीर्घ काल तक जीवनावस्था प्राप्त होती है । विष-स्थावरबिध और जंगमविष ऐसे विष के दो भेद हैं । तथा कृत्रिम विद और अकृत्रिम बिष ऐसे भी विष के भेद है । इनसे होने वाली बाधा दूर करना । भूत चिकित्सा-पिशाच को निकालने वाला शास्त्र । क्षारतंत्र-दुष्ट वरण को शोधन करने बाले द्रव्य । शालाकिक-शलाका से नेत्र के ऊपर पाये हुए पटल. को हटाकर मोती बिंदु बगैरह नेत्र रोग को दूर करने वाला शास्त्र । शल्य-भूमिशल्य और शरीर शल्य ऐसे शल्य के दो भेद हैं, तोमरादिकों को शरीर शल्य कहते हैं और हड्डी आदि . को भूमि पाल्य कहते हैं । उसको निकालने वाले शास्त्र को शल्य चिकित्सा कहते हैं। विष दूर करने वाले शास्त्र को 'विष' कहते हैं। भूत-पिशाच हटाने वाले शास्त्र को भूत शास्त्र कहते हैं । यहाँ कार्य कारणोपचार किया है । अथवा चिकित्सा शब्द प्रत्येक के साथ-कौमार, तनु, भूत इत्यादिकों के आगे जोड़ना चाहिये । जैसे कौमार चिकित्सा तनूचिकित्सा, भूतचिकित्सा इत्यादि । जैसे कौवे की प्रांख की तारिका दोनों तरफ घूमती हैं वैसे कौमारादि शब्दों के प्रागे चिकित्सा शब्द जोड़ना चाहिय । जो मुनि उपयुक्त पाठ प्रकार के चिकित्सा शास्त्र के द्वारा थावकों पर उपकार कर उन्होंने दिया हुया आहार लेता है, तब उसको पाठ प्रकार का चिकित्सा का दोष उत्पन्न होता
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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