________________
अध्याय : पाँचवाँ ।
हैं । सावधादिकों का दोप इसमें दिखता है। अत: इस चिकित्सा दोष का त्याग करना चाहिये। शोध मान माया लोभ वाले दोष---
कोधेरण य माणेण य मालालोभेण चावि उप्पादो। उप्पादणा य. दोसो चविही होदि पायवो ॥७३१॥
क्रोध, मान, माया, लोभ ऐसे चार कषायों के द्वारा भिक्षा की उत्पत्ति कराने से यह उत्पादन दोष चार प्रकार का होता है। क्रोध करके अपने लिये यदि मुनि
आहार उत्पन्न करायेगे तो क्रोध नामक उत्पादन दोष होता है । गर्व करके अपने लिये यदि मुनि श्राहार उत्पादन करेंगे तो मान दोष उत्पन्न होगा। माया-कुटिल भाव से यदि अपने लिये नाहार उत्पन्न करायेंगे तो माया नामक दोष होता है। और लोभ कांक्षा दिखाकर यदि मुनि अपने लिये आहार की उत्पत्ति करायेंगे तो लोभ नामक उत्पादन दोष उत्पन्न होता है। इस प्रकार के आहार उत्पन्न कराने से मन के परिणाम बिगड़ते हैं, अतः ऐसा पाहार त्याज्य है । दृष्टान्त के द्वारा उपरनिदिष्ट दोषों का स्पष्टीकरण--
कोधी य हत्यिकप्पे माणो वेरायडस्मि खयरस्मि । माया वारणारसिए लोहो पुरष रासियाणाम्मि १७३२॥
हस्तिकल्पपत्तन में कोई साधु ने कोध से भिक्षा को उत्पन्न करवाया । वेगातट नगर में किसी साधु ने अभिमान से भिक्षा को उत्पन्न करवाया । वारणारसी नगरी में किसी मुनि ने माया से भिक्षा को उत्पन्न करवाया और राशियान नगरी में लोभ को दिखाकर याहार उत्पन्न करवाया । क्रोधादिक कषाय उत्पन्न करके आहार लेने वाले इन मुनियों की कथा पागम में कही है; वहाँ से जान लेना चाह्मेि । . . पूर्व संस्तुति दोष का निरूपण---
दायगपुरदो कित्ती तं वासवदी जसोधरो वेत्ति ।. . पुन्बी संथुदि दोसो विस्सरिदे बोधणं चावि ॥७३३॥
दाता के ग्रागे दान ग्रहगा के पूर्व में उसकी तू दानियों में अग्रणी है. और तेरी कीति जगत में सर्वत्र फैल गई है ऐसा कहना यह पूर्व संस्तुति दोष है । और जो दाता पाहार देना भूल गया हो उसको तू पूर्व काल में महादान प्रति श्रा, अब दान देना क्यों भूल गया है ऐसा उसको संवोधन करना यह भी पूर्व संस्तुति दोष है । और जो
SIM
.