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________________ ३३४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि कीर्ति का वर्णन करना और जो स्मरण करना वह सब पूर्व संस्तुति दोष ही समझना चाहिए । स्तुति करना यह कार्य स्तुति पाटकों का है मुनिओं का नहीं है । अतः ऐसी स्तुति करना योग्य नहीं है । पश्चात संस्तुतियो का सिया पच्छा संथुदि दोसो दाएं गहिदूरा त पुणो कित्ति । विवादो दागवदी तुज्झ जसो विस्सुदो वेति ।।७३४॥ पश्चात्संस्तुति दोष-- आहारादिक दान ग्रहण करके जो मुनि दाता की तू विख्यात दानपति है, तेरा यण सर्वत्र प्रसिद्ध हुआ है ऐसी स्तुति करता है उसको यह पश्चात् संस्तुति दोष होता है । ऐसी स्तुति करने में मुनि के दीनतादिक दिग्ख पड़ते हैं। विद्यानामक उत्पादन दोष का वर्णन विज्जा साधित सिद्धा तिस्से प्रासापदाएकरणेहि ।. तिस्से महप्पेण य विज्जादोसो दु उप्पादो ।।७३५॥ साधित करने पर जो सिद्धि होती है, उसको विद्या कहते हैं। ऐसी विद्या की आशा दिखलाना अर्थात् तुझको मैं अमुक विद्या देता हूँ और उस विद्या का ऐसा ऐसा कार्य है, ऐसा महात्म्य है, ऐसा वर्णन करके दाता के मन में उस विद्या की अभिलाषा उत्पन्न करके उससे आहारादिक दान ग्रहण करना यह विद्रा नामक उत्पादन मंत्रोत्पादन दोष का स्वरूप __ सिद्ध पढिदे मंते तस्स य प्रासापदान कररोण । तस्स य माहप्पेण य उत्पादो मंतदोसो दु ।।७३६।। पठन मात्र से जो मंत्र सिद्ध होता है, उसे पठित सिद्ध मंत्र कहते हैं। ऐसा मंत्र तुझको मैं देता हूँ ऐसा कहकर दाता के हृदय में उसकी प्राशा उत्पन्न कर और सर्प विष, वृश्चिक विष दूर करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा मंत्र का महात्म्य दिखाकर जो साधु उपजीवन करता है और माहारादिक ग्रहरण करता है, उसको मंत्रोत्पाद दोन उत्पन्न होता है। इस प्रकार से अाहारादिक ग्रहण करने में लोगों की प्रतारणा करना, जिह्वालम्पट होना, इत्यादि दोघं हैं । ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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