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________________ man ध्यध्याय : पांचवां ] विद्योत्पादन दोष और मंत्रोत्पादन दोष का अन्य प्रकार से स्वरूप वर्णन--- श्राहार वायगाणं विज्जामंतेहि देवदाणं तु । प्राह्य साधि दवा विजमतो हवे दोसो ।।७३७॥ ग्राहारदान देने वाली व्यंतर देवताओं को विद्या से और मंत्र से बुलाकर उसको आहार दान के लिये सिद्ध करना यह विद्या दोष और मंत्र दोष है । अपना ग्राहार दायकों के लिये विद्या से या मंत्र से देवताओं को बुलाकर उनको सिद्ध करना यह विद्यामंत्र दोप है । इस दोष को विद्या दोप अोर मंत्र दोष में अन्तर्भूत करने से यह पृथक दोष नहीं है। चर्ग दोष का स्वरूप---- णेत्तस्संजरगच्चुगणं भूसरपचुण्णं च गत्तसोभयरं। चुण्णं तेप्पादा चुपणयदोसो हवदि एसो ।।७३८।। आँखें निर्मल करने के लिये अंजन वर्ण देना, तथा जिससे तिलक किया जाता है और पत्रवल्ली पाटीर पाः ची जाती है, ऐसा धारीर शोभा बढ़ाने वाला चूर्ण दाता को देना । जिस चूर्ण से शरीर की शोभा-कान्ति बढ़ती है, निर्मलता उत्पन्न होती है, ऐसा चूर्ण दाता को देना ऐसे चूर्ण से भोजन की उत्पत्ति करना वह चुरोत्पादन नामक दोष है । इससे उपजीविका करना यह दोष है । मूलकर्म दोष का स्वरूप अवसारणं वसियरणं संजोजयणं च विप्पजुत्तारणं- . . . . . भरिमयं तु मूलकम्म एदे उपादसा दोसा ॥७३.६।। जो वश नहीं है उनको वश करना तथा जो वियुक्त है, उनका संयोग करना यह मूल कर्म है । इस मूल कर्म से जो अाहारादिक उत्पन्न करना यह मुलकर्म नामक दोप हैं । इस वशीकरगा से उपजीविका करना यह दोध इसमें है तथा यह कार्य लज्जा हप्पद है । ये उत्पादनादिक दोष और उद्गमादिक दोष त्याज्य ही हैं। क्योंकि इसमें अधः कर्म का अंश पाया जाता है । अन्य भी जुगुप्सादिक दोष हैं। उनसे सम्यग्दर्शनादिकों में दूधा उत्पन्न होते हैं। उनका भी त्याग करना चाहिये । अशन दोष का निरूपण--- संकि वमक्खि दरिणक्खि पि. हिद संवबरण दाय गुम्मिस्से । अपरिणदलित छोडिद एसरण घोसाई बस एदे ।।७४०॥ .. .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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