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________________ ३१४ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिग १२. काकादिपिड हरण---कौवा, गीध पक्षी इत्यादिकों के द्वारा साधु के हाथ से अन्न का ग्रास हरण करने पर भोजनांतराय होता है। १३. पिंड पतन ---भोजन करते समय मुनि के हाथ से ग्रास गिर जामा । पाणीए. जंतुबहो मंसादी दंसणे य उवसग्गो। पादतरमि जीवो संपादो भायरगाणं च ॥४१॥ १४. पाणौ जन्तु वध-हस्त पात्र में प्राणी अाकर स्वयं यदि मरे तो अन्तराय है । मांसादि दर्शन-मांस, मद्य और मरे हुए पंचेन्द्रिय का शरीर ये पदार्थ दीखने पर अंतराय समझना । १६. पादान्तरे जीव-आहार लेते समय दोनों पावों के बीच में से पंचेन्द्रिय जीव का निकल जाना। १७. देवाद्य पसर्ग--देव, मनुष्य, तिर्यचों में से किसी के द्वारा ग्राहार लेते समय मुनि को उपद्रव होने पर अंतराय होता है। १५. भोजन संपात-परोसने वाले के हाथ से पात्र गिर जाने पर अंतराय होता। । २०. उच्चारं पस्सवणं अभोज्जगिहपोवेसरणं तहा पडणं । उववेसणं सदंसं भूमी संफास गिळवणं ॥४२॥ उच्चार-पाहार के समय अपने उदर में से मल-विष्ठा यदि निकलेगा तो. अन्तराय होता है। प्रस्त्रधरण ----मूत्र और शुक्रादिक यदि निकलेंगे तो अन्तराय होता है । अभोज्य गृह में प्रवेश याहार के लिये निकले हुए साधु का यदि चांडालादि अस्पृश्य लोगों के गृह में प्रवेश हो जाय तो अंतराय होता है । "प्रभोजिगिह भोजणं" ऐसा भी पाठ है । इस पाठ का अर्थ-भोजन के लिये अयोग्य ऐसे चांडालादिक अस्पृश्य लोक अभोज्य माने जाते हैं और सूतक पातकादिक का. संबंध जिनको प्राप्त हुअा है ऐसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी अभोज्य . माने जाते हैं इनके घर में भोजन करना अन्तराय है ।। पतनं---भ्रम, थकावट, मूर्छादिक से यदि साधु गिर जाय तो अन्तराय है । उपवेशन--साधु यदि बैठ गये तो अन्तराब है। सदक्ष-कुत्ता, बिल्ली वगैरह का दंश होने से अन्तराय है । . २२. २३. PHOT -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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