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________________ अध्याय : पांचयां ] १. काक नाम का अन्तराय-काक शब्द से बक, श्येन अर्थात् बाज वगैरह पक्षिओं का भी उपलक्षरण से ग्रहण करना चाहिये । मुनि आहार को जा रहे हैं अभया पाहा. लिये बड़े हो गये हैं ऐसे समय यदि कौवा, बक और श्येन वगैरह पक्षी मुनियों के शरीर पर मल मूत्र करेंगे तो भोजनांतराय होता है। अमेध्यान्तराय-अपवित्र विष्टादिक से पादादिक लिप्त होने पर भोजनां तराय होता है। . . ३. छर्दि-मुनिराज को बमन होना । ४. रोधन -ग्राहार के लिए. तुम नहीं जा सकते ऐसा कहकर प्रतिबंध करना । ५. रुधिर—अपना रक्त अथवा अन्य का रक्त देह से चार अंगुल पर्यन्त बहता हुअा दृष्टिगत होने पर भोजनांतराय होता है। इससे कम वहने पर अन्तनहीं है। गाथा में च शब्द पाया है उससे पीव प्रादि पदार्थ अपने या पर के देह से चार अंगुल पर्यन्त बहते हुए दीखने पर भी नन्तराय समझना चाहिये। ६. प्रच पाल---दुःख से अपने नेत्रों में तथा पर के नेत्रों में यदि अश्रु आते हो तो भोजनांतराय होता है । जावधः परामर्श-गोडे घोटे के नीचे यदि हाथ से स्पर्श हो जावे तो अंतराय होता है। ८. जान परिव्यतिक्रम-गोडे के ऊपर के अवयवों का स्पर्श होने पर अंतराय होता है। रणाभिप्रधोणिग्यमणं पच्चाक्खिय सेवा य जंतुबहो । कागादि पिंड हरणं पाणीदो पिंड पडणं च ॥४०॥ ६. . नाभ्यधोनिर्गमन-नाभि के नीचे मस्तक करके यदि जहाँ अाहार को जाना पड़ता हो तो वह अन्तराय होता है। प्रत्याख्यात सेवन—जिस वस्तु का देव, गुरु की साक्षी से त्याग किया है. उस वस्तु को भक्षरण करना अाहार का अन्तराय होता है। जंतुवध-अपने सामने मार्जारादिक के द्वारा चूहा वगैरह प्राणी का वध होना । .. .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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