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[ गो. प्र. चिन्तामगिए ८. मूल-पुनः चारित्र ग्रहण करना अर्थात् पुनः मुनि दीक्षा बारगा करना मूल
प्रायश्चित है। ६. परिहार---ऋषि, अति, अनगार, मुनि ऐसे चार प्रकार के संघ से कुछ काल तक
बहिष्कार करना यह परिहार प्रायश्चित है । - श्रद्धान—मिथ्यात्व को प्राप्त हुए मन को लौटाकर सम्यग्दर्शन में स्थिर करना ।
. विनयतप-अशुभ क्रिया करना ये दर्शन, ज्ञान, चारित्र व तप के अतिचार ... हैं। इन अतिचारों को दूर करना यह बिनय तप है।
.. वयावृत्य-चारित्र के कारण रूप औपध, शरीर शुश्रुषा, मल मूत्र साफ करना यह वैयावृत्य तप है।
स्वाध्याय -- अंग व पूर्वो का निदॉप विधि पूर्वक अध्ययन करना। ध्यान-शुभ विषय में वित्त को स्थिर करना ध्यान हैं।
गुप्ति--साबद्य-पाप योग से आत्मा का रक्षण करना । गुक्ति के मनोगुप्ति, बचनगुप्ति, श्रार काय गस्ति ऐसे तीन भेद हैं। सब प्रकार के तप, गुप्ति और नित्य क्रियाओं का अन्तर्भाव मूल गुरणों में ही होता है और कादाचित्व क्रियाओं का अर्थात् ..
आतापनादि योगों का उत्तर गुणों में अन्तर्भाव होता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और चारित्र का भी मूल गुराणों में ही अन्तर्भाव होता है। कारण इनके बिना मूल गुणा होता ही नहीं। मूल गुण पालन करने से फल--- ..
एवं विहारगजुत्ते मूल गणे पालिऊण तिविहेण । होऊण जगादि पुज्जो अक्खय सोक्खं लहदि मोक्खं ।।६६४॥
ऊपर कहे हुए प्रकार से सम्यक्त्व, सम्यग्ज्ञानादि पूर्वक कम से कहे हुए अठ्ठावीस मूल गुणों को मन, वचन और शारीर से उत्तम रीति से निर्दोषं पालन करके मुनीराज जगत में पूज्यनीय होते हैं और अन्त में बाधा रहित, अष्टकों के नाश से मोक्ष सुख को पाते हैं। अन्तरायों का स्वरूप .. कागा मेज्झा छद्दी रोहण रूहिरं च अस्सुवादच ।
जण्हहिछामरिसं जाहुबरि बदिक्कमो . चेव ।।६६५।।