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________________ अध्याय : पांचवां ] भोजन करही करूंगा, अन्य को भोजन नहीं कराऊंगा, मैं अनुमति नहीं दूंगा। मैं भोजन करता है, तुमको भोजन करो ऐसा नहीं कहता हूँ । चार प्रकार के शरीर से ग्रहण नहीं करता हूँ । हाथ के इशारे से दूसरे को हूँ और भोजन में प्रवृत को शरीर से अनुमति नहीं देता हूं। वंधन की कारणभूत ऐसी मन, वचन व शरीर की क्रियाओं का त्याग करना अनशन तप है । प्रवृत नहीं करता इस प्रकार कर्म ४. ५. [ ३११ भोजन करने वाले को भोजन कराता हूँ, तुम प्रहार का संकल्प पूर्वक ७. अमोदर्य तृप्ति और दर्प उत्पन्न करने वाले भोजन का मन, बचन, काय से त्याग करना अर्थात् अल्प भोजन करना । वृत्ति परिसंख्यान - घर, पात्र, दाता इत्यादिकों का नियम करके आहार संज्ञा को जीतना । रस परित्याग -- मन, वचन और शरीर से रस व काय क्लेश- शरीर में सुखाभिलाषा का त्याग करना । विविक्त शय्यासन -चित्त की व्याकुलता के कारण जहां नहीं है ऐसे एकान्त स्थान में सोना और बैठना । इस प्रकार बाह्य तप के छह प्रकार हैं | अभ्यंतर लंपटता को छोड़ना । तब वर्णन इस प्रकार समझना -- आलोचना -- स्वयं किये हुए अपराध नहीं छिपाना । प्रतिक्रमण - स्वतः उत्पन्न किये अशुभ मनो वचन काय की प्रवृत्तियों से हटना अर्थात् मेरी यह प्रवृत्ति मिथ्या हो, ऐसी खोटी प्रवृत्ति नहीं करूंगा ऐसा संकल्प करना । तदुभव -- उपर्युक्त दोनों का त्याग करना अर्थात् दोषों को न विपाना और शुभ प्रवृत्ति का त्याग करना । ४. विवेक -- जिससे यथवा जिसमें अशुभयोग हुआ था उस वस्तु को छोड़ना, उससे दूर होना कायोत्सर्ग - देह के ऊपर ममत्व नहीं रखना । तप — उत्पन्न हुए दोपों का परिहार करने के लिये उपवासादिक करना । · छेद ---- संयम से ग्लानि होने के लिये दीक्षा के दिन मासादिक कम करना ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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