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[ गो. प्र. चिन्तामगि
सूर्योदय की तीन घटिका और सूर्यास्त की तीन घटिका छोड़कर बीच के एक मुहूतकाल में, दोनों मुहूतकाल में किंवा तीन मुर्हत काल में जो ग्राहार लेना वह एक भक्त है ।
विशेषार्थ :- तीन घटिका प्रभास उदयकाल और ग्रस्तकाल को छोड़कर तथा मध्यान्ह सामायिक काल भी छोड़कर मध्य काल में भोजन करना यह एक भवत है । अथवा अहोरात्र मध्ये मोज़न वेला दो हैं । उसमें से दिन को भोजन बेला में ऊपर के कथानुसार भोजन करना एक भक्त है। एक भक्त और एक स्थान इसमें फरकतीन मुल के बीच में एक स्थान में चरण-विक्षेप न करके अर्थात् एक स्थान छोड़कर अन्य स्थान में न जाकर भोजन करना एक स्थान है और तीन मुर्हत में एक क्षेत्र की मर्यादा न करते हुए अन्यत्र भोजन करना एक भक्त है। प्रायश्चित्त ग्रंथ में एक स्थान उत्तर गुण है व एक भक्त मूल गुण है ऐसा कहा है। यह भेद इंद्रिय जय, अभिलाषा का त्याग, महा पुरुषों का आचरण अपन पायें इस हेतु से किया है ।
प्रश्न : - इस प्रकार महाव्रत में भेद क्यों किया है ?
उत्तर :-- छेदोपस्थापना संयम के ग्राश्रय से ग्रहिंसा, सत्य, ग्रवीर्य इत्यादि पांच भेद होते हैं ।
प्रश्न :- महाव्रत और समिति में क्या विशेषता है ?
उत्तर :- महाव्रत और समिति में प्रभेद है ऐसा समझना योग्य नहीं है । समिति में जाना, बैठना, भोजन करना मल मूत्र क्षेपण करना इत्यादिक क्रिया यत्ताचार पूर्वक होती हैं । अर्थात् समिति क्रियात्मक है और महाव्रत अक्रियात्मक है श्रर्थात् परिणामात्मक होने से प्रक्रियात्मक है । मैं हिंसा वगैरह पापों का सर्वथा त्याग करता हूँ ऐसा संकल्प महाव्रतों में है बाह्य क्रियात्मकता उनमें नहीं है इसलिये वे क्रियात्मक हैं |
ये महाव्रत श्री समिति धारण करने से आत्मा को दुःख होता है ऐसा समझना प्रयोग्य है । जैसे वैद्य रोगी का फोड़ा फोड़ता है तो रोगी का दुःख दूर करता है | वैसे महाव्रत समिति का याचरण दुःख के लिये नहीं है । उनसे सुख की प्राप्ति होती है ।
तप और गुप्ति का कहां अन्तर्भाव होता है ?
अनशन तप - भोजन का त्याग करना, उसके तीन प्रकार हैं। मैं मन के द्वारा