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________________ अध्याय : पांचवां ] स्वरूप कहा है वह व्यर्थ होगा। इसी प्रकार पांव से कुछ ग्रहण करना (पादेन किंचिद्ग्रहणं) इत्यादिक अन्तरायों का वर्णन करना व्यर्थ है ऐसा समझना पड़ेगा। अञ्जलीपुट छोड़कर अन्यत्र जाने का यदि निषेध ही होगा तो 'हाथ से कुछ ग्रहगा करना यह भोजन का अन्तराय है' ऐसा कहना योग्य नहीं होगा। मुनि हाथ से ग्रहण करे अथवा न करे अजंलिपुट छुटने से अन्तराय हुआ ऐसा मानना पड़ेगा तो अन्यत्रं आहार को कैसे जा सकेंगे । गोडों के नीचे के अवयव का स्पर्शन होना यह भी अन्तराय का विशेषमा नहीं हो सकेगा । ये अन्लराय सिद्ध भक्ति जब तक नहीं की है तब तक होने हैं ऐसा भी न समझे । ऐसा समझने पर तो भोजन का अभाव हो जायेगा । परंतु ऐसी कल्पना अयोग्य है। जब तक सिद्धभक्ति मुनियों ने नहीं की है तब तक वे बैठते हैं व सिद्ध भक्ति करने के अनन्तर खड़े होकर भोजन करेंगे । जब तक बैठे हैं तब तक काकादि पिंड हरण नाम के अन्तराय की संभावना नहीं होती है । (कौवे वगैरह पक्षी का हाथ में से ग्रास को उठा लेना) । प्रश्न :--यह स्थिति भोजन मुनि क्यों करते हैं ?... उत्तर :-जब तक मेरे हाथ और पांव चलते फिरते हैं, तब तक आहार ग्रहण योग्य है । अन्यथा नहीं यह सूचित हो इसलिए वे स्थिति भोजन करते हैं। अपने दो हाथ में ही भोजन करना, यह बैठकर पात्र के द्वारा अथवा अन्य के हाथ से से मैं भोजन नहीं करूंगा इस प्रतिज्ञा का पालन करने के लिये समझना चाहिये। अपने हाथ के तल शुद्ध होते हैं और स्व हस्त में भोजन करने से बहुत अन्न का विर्सजन-छोड़ देना नहीं होता है (यदि पात्र में भोजन मुनि. करेंगे तो सर्व पाहार से भरी हुई थाली छोड़ देंगे । तथा ऐसा छोड़ना दोष है । इंद्रिय संयम और प्राणि संयम का पालन करने के लिये मुनि खड़े होकर भोजन करते हैं ! मुनि जन जब तक आहार करते हैं तब तक समपाद व अलिपुट धारणा करके ही रहे । यदि उसमें समपादता विगड़ जायगी या अञ्जलिपुट छूट जायगा तो याहार छोड़ना चाहिये । क्योंकि यह अन्तराय हुमा है ऐसा समझना चाहिये ।। एक भक्त का स्वरूप उदयत्थमरणे काले गालीतियवज्जियम्हि मज्झम्हि । एकम्हि : . दुध लिए. मुहुत्त कालेय · भत्तं तु ॥६६३॥ .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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