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[ गो. प्र. चिन्तामणि .. स्थिति भोजन खड़े होकर भोजन करना इस मूलगुरण का स्वरूप-- .
अंजलि पुडेण हिच्चा कुड्डाइ विवज्जणेरण समपायं । पडि सुद्ध भूमितिये. प्रसरणं ठिदि भोयरसं गाम ॥६६२॥
मुनि खड़े होकर अंजलि पुट के द्वारा अर्थात् हाथ रूपी पात्र के द्वारा आहार लेते हैं। भित्ती, खांब वगैरह का आश्रय लेकर तथा बैठकर किंवा सोते हुए और
तिरछे लेटकर बाहार नहीं लेते हैं। खड़े होकर ग्राहार लेते समय अपने दो पांवों के ... बीच में चार अगुल का अन्तर रखना चाहिये । जीववधादिक से रहित ऐसे तीन भूमि
प्रदेश में मुनि याहार लेते हैं। जिस स्थान पर मुनि पाहार के लिए खड़े होते हैं, ऐसा प्रदेश उनके चरणों का भूमि प्रदेश, उच्छिष्ट जहां पड़ता है ऐसा प्रदेश, तथा दाता जहां खड़ा होकर आहार देता है वह प्रदेश, ऐसे तीन भूमि प्रदेश जीव वधादिक दोषों से रहित होने चाहिये । ऐसे शुद्ध प्रदेश में खड़े होकर पावों में बार अंगुल का अन्तर रखकर भीत, खाब वगैरह का आश्रय नहीं लेते हुए हस्त पुट से याहार लेना इसको स्थिति भोजन कहते हैं।
विशेषा.....नि. दिन में कार ही भोजन करते हैं। उनके पाहार का काल जघन्य तीन मुहूर्त तक कहा है। परन्तु तीन मुहर्त तक पाबों को समान्तर रखकर अंजलिपुट के द्वारा प्राहार लेना चाहिये, ऐसा उसका अभिप्राय नहीं है। उसका अभिप्राय इस प्रकार है। तीन मुहूत काल के बीच में जब कभी मुनि भोजन करते हैं उस समय में चरण समान्तर रखकर अंजुलिपुट से भोजन करे। यदि भोजन क्रिया के समपाद और अंजुलिपुट ये विशषण नहीं माने जायेंगे तो हाथ धोने पर भी अन्यत्र ग्राहार के लिये जाते समय, 'जानुपरिव्यतिक्रम् नाम का जो अन्तराय यागम में कहा है उसको व्यर्थता होगी । “नाभेर धोनिर्गमन' नाम का अन्तराय मानने की भी अावश्यकता नहीं होगी। इससे यह सिद्ध होता है कि, तीन मुहूर्त के मध्य में किसीः । दाता के घर में भोजन क्रिया प्रारंभ करके किसी कारण से हाथ धोकर मौल से अन्य श्रावक के घर पाहार के लिए मुनि जावे ।
..यदि उपर्युक्त अन्तराय एक घर में ही पाहार करने वाले मुनि को होता है .. . ऐसे कहोगे तो 'जानूपरिव्यतिक्रम' यह विशेषरण व्यर्थ होगा तथा समपाद में थोड़ी सी
भी चंचलता आई तो अन्तराय माना जावेगा 'नाभेर बोनिर्गमन' अन्तराय तो दूर ही - रहा उसकी संभावना भी नहीं होगी । अतः उनका परिहार करने के लिये जो उनका
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