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अध्याय : पाँचवाँ ] .
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भूमिशयन वत का वर्णन
फासुयभूमिपएसे अप्पमसंधारिदम्हि पच्छण्णे । दंड घणुब्ध सेज्जं खिदिसमणं एयपासेरण ॥६६०।।
जहाँ जीव हिमा, मर्दन कलह संवले परिणाम नहीं होते हैं, ऐसे जीव वध रहित निर्जन्तुक भूमि प्रदेश में जहां अल्प भी तृणादिक प्रक्षिप्त नहीं है, अर्थात् जहां शयन के लिये थोड़ा भी तृषा नहीं है । अथवा जहाँ अल्पसंस्तर है, अर्थात् तृणमय काष्ठ का बना हुया फलक किंवा शिला है, ऐसे भूप्रदेश में जो किं . गृहस्थ योग्य प्रच्छादन और शय्या से रहित है, ऐसे स्थान में सोना यह भूशयन नामक मूलगुण है । अथवा जहाँ अात्मना-- स्वतः तृणादिक बिछाया है, ऐसे भूप्रदेश में---किंवा अपने शरीर के प्रमाणानुसार-गस्त र-चारित्र योग्य-प्रासुक-तृणादिक है, ऐसे भूमि प्रदेश में सोना चाहिये । वह भूमि प्रदेश गुप्त अर्थात् एकांत युक्त होना चाहिए तथा स्त्री, पशु ब नपुंसक रहित, संयत लोकों के संचार से रहित होना चाहिये । ऐसे भूमि प्रदेश में दण्ड के समान किया धनुष्य के समान एक बगल से सोना चाहिए । नीचे मुख करके अथवा ऊपर मुख करके नहीं सोवे । क्योंकि ऐसे सोने से स्वप्न दोष उत्पन्न होते हैं। उपयुक्त प्रकार से सोना क्षितिशयन मूलगुण है। प्रश्न-~-इसका पालन चयों करना चाहिये ? उत्तर- इंद्रिय सुख का त्याग करने के लिए, तथा तप मजबूत होने के लिए तथा शरीरादिकों पर निःस्पृहता उत्पन्न होने के लिए यह भूशय्या नामक मूलगुग है। अदन्तधोवन व्रत का लक्षण
अंगलिबहाबलेहरिण कलीहिं पासागछल्लि यादीहि । दंत मला सोहरण्यं संजमयुत्ती प्रदंतमरकं ॥६६॥
हाथ की अंगुली, नख, दात स्वच्छ करने की निब बगैरह की लकड़ी तथा तुमा विशेष इनके द्वारा और पाषाण, वृक्ष की छाल, खप्पर अथवा ठिकरा, संदुल का भूसा अथवा पाटा इन पदार्थों के द्वारा मुनि दोनों का मल नहीं निकालते हैं । दांतों का मल नहीं निकालने से उनके इंद्रियसंयम का रक्षरण होता है। इस मूल गुण का पालन करने से मुनियों को वीरागता प्राप्त होती है तथा सर्वज्ञ जिनेश्वर की प्राज्ञा का पालन होता है।