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________________ [ गो. प्र. चिन्तामरिग तथा विलेपनादि से रहित होने से रागादिक विकार उत्पन्न नहीं करता है । यह नैर्ग्रन्थ-वाह्यभ्यंतर परिग्रहों से रहित है। इन वस्त्रादिकों को मुनिराज मन, बचन, काय से त्यागते हैं । यह प्राचेलवय मूलगुण जगत में महापुरुषों के द्वारा स्वीकार किया गया है, अतः वंदनीय है-मान्य है ! प्रान-वस्त्रादिक को ग्रहण करने से कौन दोष उत्पन्न होते हैं ? उत्तर--वस्त्रादिक को ग्रहण करने पर यूकादिक जीवों की हिंसा, वस्त्र प्राप्त करने की इच्छा, प्रक्षालन, याचना करना इत्यादिक दोष उत्पन्न होते हैं। ध्यानाध्ययनादिक में विघ्न'. उत्पन्न होता है, अतः मुनिराज आचेलवय मूलगुण के धारक होते हैं। अस्नान व्रत का स्वरूप हारणादिवज्जणेरण य विलित जल्लमल सेव सम्वगं । अण्हाण घोर गुणं संजम दुगपालयं मुणिगो ॥६८६।। स्नानादि वर्जन अर्थात् जल में प्रवेश करके स्नान करना, शरीर में मुगन्धी उबटन लगाना, प्रांखों में अंजन लगाना, अंग को जल से धोना, तांबूल भक्षण करना इत्यादिक अंगोपांग को सुखी करने के साधन हैं। इनका त्याग करने से अस्नान नामक व्रत का पालन होता है। सर्व अंग जिससे मलिन होता है, ढक जाता है ऐसे मल को जल्ल कहते हैं । अंग का एकाकि भाग जिससे व्याप्त होता है : ...। उसको मल कहते हैं। रोम के छिद्रों से जो जल बाहर आता है, उसको स्वेद कहते हैं । इस अस्नानन्द्रत के धारण करने से शरीर उपयुक्त जल्लादिक मल से व्याप्त होता है । यह अस्नान व्रत महागुरण है । इससे उत्कृष्ट गुरणों की प्राप्ति होती है। इस व्रत से प्राणिसंयम और इंद्रियसंयम का पालन होता है। प्रश्न----स्नानादिक का त्याग करने से अशुचिपना आवेगा? उत्तर-स्नान । करने से मुनि को पवित्रता नहीं पाती । अतों से मुनि पवित्र होते हैं। यदि अत रहित प्राणी जलावगाहनादिक से पवित्र होते हैं. तो मत्स्य, मगर और दुराचारी लोक पवित्र मानने पड़ेंगे। परन्तु उनको कोई पवित्र नहीं मानते हैं । अतः व्रत, नियम, संयम ही पवित्रता के कारण हैं । जलादिक नाना सूक्ष्म जन्तुओं से भरा हुआ है, जल स्नान सर्व पाप का मूल है। इसलिये मुनि गरण जलादिक से स्नान नहीं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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