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अध्याय : पांचवां ]
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महित जो शरीर के ऊपर के ममत्व का त्याग किया जाता है । वह कार्योत्सर्ग नामक मूलगुण है। लोच मूल गुण का स्वरूप---
वियतियचउक्कमासे लोचो उक्कस्समजिसमजहपषो। सपडिपकमणे दिवसे उववासेणेव कायवधी ॥६८७॥
हाथ से मस्तक के केश, दाढ़ी और मूछ उखाड़ना यह लोच का लक्षण हैं। यह लोच सम्मुर्छनादि जीवों की उत्पत्ति मस्तकादिकों में न होवे इस वास्ते तथा शरीर में राग मोह विकार न होवे इमलिये स्वशक्ति प्रगट करने के लिए, सर्वोत्कृष्ट, तपश्चरण के लिए, मुनिलिंग के गुण समझने के लिये मुनि करते हैं । इस लोच के उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य ऐसे तीन भेद हैं। इन भेदों से क्रम से उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य आचरण के भेद मुचित होते हैं। उत्कृष्ट लोच दो महीने पूर्ण होने पर अथवा अपुर्ण होने पर मुनि करते हैं। यह लोच दिन में उपवास पूर्वक करना चाहिये । पाक्षिक चातुर्मासिक प्रतिक्रमण के समय लोच करे। परन्तु उपवास पूर्वक ही करे । प्रतिक्रमण रहित दिवस में भी लोच करें । अथवा 'सप्रतिक्रमणे दिवसे' इन पदों का अभिप्राय 'लोच करके प्रतिक्रमण करें ऐसा होता है। लोच शब्द लुच धातु से बना है और इस धातु का अर्थ अपनयन-~-दूर करना, निकालना ऐसा है । प्रश्न -केशों का अपनयन-निकालना क्षुरादिक से-कैंची, उस्तरा आदि से भी होता है तो हाथ से मस्तक के और दाढ़ी, मूछ के केश क्यों उखाड़ना चाहिये ? उत्तर-दीनता, याचना, परिग्रह, अपमान इत्यादिक दोष क्षुरादिक के द्वारा केश निकालने में होते हैं। अतः मुनिराज अपने हाथ से ही केशलोंच करते हैं। अचेलकत्व मूल गुग का स्वरूप-----
बस्थाजिरग वक्केश य अहवा पत्ताइगा असंवरणं । बिभसरपरिणगंथं ऊच्चेलक्कं जगदि. पुज्जं ॥६॥
यस्त्र-धोती, दुपट्टा, कंवलादिक, अजिन-हरिण, बाघ वगैरह का चर्म । बल्कल वृक्ष की छाल. से बने हुए बल्कल बस्न इनके द्वारा शरीर को न ढकना यह आचेलश्य मूलगुण है । अथवा वृक्ष के पत्ते, तृग वगैरह से अपना शरीर न ढकना यह भी ग्रावेलक्य मूलगुरणं है । यह आचेलक्य कडा, केयूर, हार, मृकुट वगैरह अलंकार ।
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