________________
३०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामण
हुये दोषों का त्याग करना प्रतिक्रमण है । भविष्यकाल और वर्तमान काल में द्रव्यादिक के दोषों का त्याग करना प्रत्याख्यान है । ऐसा इन दोनों में भेद i तपश्चरण के लिए निर्दोष ऐसे भी द्रव्यादिकों का त्याग करना प्रत्याख्यान है और 1. प्रतिक्रमण दोष परिहार के लिए ही किया जाता है । ऐसी इनमें भिन्नता है । विशेषार्थ - भविष्यकाल में और वर्तमान काल में नामादिक छह अयोग्यपापास्वव के कारणों का शुभ मन वचन काय से त्याग करना यह प्रत्याख्यान है । इसका खुलासा मैं शरीर के द्वारा किसी का शुभ नाम न करूंगा, न कराऊंगा और नुमोदन नहीं दूंगा । दचन के द्वारा मैं अयोग्य नाम नहीं कहूंगा, मैं नहीं कहाऊंगा और कहने वालों को अनुमोदन में नहीं दुगा । मन के द्वारा अशुभ नाम का चितन नहीं करूंगा, नहीं कराऊंगा और उसके विषय में अनुमोदन भी नहीं दूंगा । इस ही प्रकार अशुभ स्थापना को मैं शरीर से नहीं करूंगा, नहीं कराऊंगा और करने वालों. को सम्मति नहीं दूंगा । वचन से नहीं बोलूंगा, नहीं बुलवाऊंगा और बोलने वाले को सम्मति नहीं दूंगा । मन से में अशुभ स्थापना का चिंतन नहीं करूंगा, दूसरों से चितन न कराऊंगा और अशुभ स्थापना का चितन करने वाले को अनुमोदन नहीं दूंगा। दोप सहित द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावों का में शरीर के द्वारा सेवन नहीं करूंगा, सेवन नहीं कराऊंगा और सेवन करने वालों को अनुमति नहीं दूंगा । वचन से सेवन कर में ऐसा नहीं कहूंगा, नहीं कहाऊंगा और सेवन करने वाले को सूने अच्छा किया ऐसी अनुमति वचन से नहीं दूंगा । मन के द्वारा में अशुभ द्रव्यादिकों का चितन नहीं करूंगा, दूसरों को चितन न कराऊंगा और करने वालों को सम्मति नहीं दूंगा । ऐसे सत्ताईस प्रकार के नामांदिक छहों के दोषों का त्याग शुभ मन, वचन, काय से करना प्रत्याख्यान है ।
कायोत्सर्ग का स्वरूप ---
देवसिरिणयमावि जहुत्तमारोण उत्तकालम्हि |
जिरण गुरण चितण जुत्तो काउस्सग्यो त विसग्गो ॥ ६८६ ॥
दिवस, रात्रि, पाक्षिक, चार महीने की वार्षिक वगैरह निश्चय क्रियाथों में परमेष्ठियों ने जो पच्चीस, सत्ताईस, एक सौ ग्राठ वगैरह प्रमाण रूप उच्छ्वास संख्या जिस काल में कहीं है, उस काल में जिन गुण स्मरण सहित अर्थात् सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र शुक्ल ध्यान, धर्म ध्यान अनंत ज्ञानादिचतुष्टय इत्यादि गुणों के चितन