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________________ अध्याय : पांचवां ] सर्वे पूर्ण महीभृतः क्षतिमतः कस्यापि कालत्रये त्राताऽत्रास्ति न नाशमोयुषि पुरा पुण्याजिते वायुषि ।।१०४८ ॥ | ४३३ मन्त्र तन्त्रों का समूह, मन्त्र तन्त्र के जानने वाले की कृति, शत्रुओं से दुर्गम किले, मित्रों का समूह, नौकर रक्षक थे, इनके होने पर भी सर्व पूर्व राजा लोग क्या नाश को नहीं प्राप्त हुए ? इसलिये इस लोक में तीन कालों में पूर्व में उपार्जित .. के नाश हो जाने पर किसका रक्षक कोई भी नहीं है, यह शरण भावना है । संसार भावना जातिगतिव्याप्तकरणोऽनंतांगहारः सदा, वृत्या प्रोभूति प्रलयो नरामर मृगाचाहार्य पर्यायवान् हित्वा सात्विक भाव जात मित्तरंभविः स्वकर्मोद्भवैः, rasयं नटभ्रमत्यभिनवः सर्वत्र लोकत्रये ॥१०४९ ॥ पञ्च परिवर्तने रूपं परिभ्रमरण से ८४ लाख जाति और चार गतियों में प्राप्त किया है इन्द्रिय लाभ जिसने, अपरिमित शरीरधारी हमेशा उत्पत्ति और विनाशवान् नर, मानव, पशु आदि पर्यायों को धारण करने वाला यह जीव सात्विक भाव से उत्पन्न अनन्त ज्ञाननिधि को छोड़कर इतर स्वकर्मों से उत्पन्न मिथ्यात्वादि भावों के द्वारा नूतन शरीर को वार करके सर्वत्र तीन लोक में नट के समान भ्रमण करता है । यह संसार भावना है । एकत्व भावना astra: स्वजनोऽनुगोऽस्ति न परो वा यालि अन्मांतर, जीवे जन्म निवाsa मित्रनिकरैः किं नाशितं वा हतम् । चित्रं गावराजाविजं हृदयजं asardaar मृत्युत्पत्ति निवृतिषु प्रणयिनोऽन्येऽर्थेष्वनर्थे निजः ॥ १०५० ॥ प्राप्त स्वजन साथ में चलने वाला दूसरा कोई भी जन्मान्तर में साथ नहीं जाता है अथवा इस जन्म में मित्रों के समूह के द्वारा चित्र शरीर के रोगादि से उत्पन्न अथवा मानसिक असाता क्या किसी के द्वारा नाश की गई है जन्म, मरण और निर्वाण में जीव अकेला ही है। धन के समय पाप में स्वयं ही जीव भागी होता है। यह एकत्व भावना है । अथवा हरी गई है ? दूसरे प्यारे बनते हैं,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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