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[गो. प्र. चिन्तामणि शक्त्या युक्तसंख्यलोक मितषट् स्थानान्वितं स्थानया, इत्येवं बिनयो विपाक विचयः प्रत्यस्तदोषोच्चय. ॥१०४५।।
गति आदि में परिणामों से प्राणियों के प्राप्त है उदय और उदीरणा जिन की, ऐसे क्लेशों को करने वाले और सुख को करने वाले असंख्यात लोक प्रमाण, षट् । स्थान से अन्वित शक्ति से युक्त अशुभ वह शुभ कर्म है, इस प्रकार विचार करना नष्ट हो गया है दोषों का समूह जिसका, ऐसा विषाक विचय है ।।
* बारह अनुप्रेक्षा * . . सस्थानं यदनित्यताऽशरगता संसार एकाकिता, ज्यत्वं चाशुचिताऽस्त्रवः सुनयतः स्यात्संवरो निर्जरा । लोको बोध्यति दुर्लभत्वमपरो 'धर्मस्तदित्यन्वित, ..... भेदैः स्वैचिंचयोऽस्य धितनमनुप्रक्षा, स्मृतं द्वादश ॥१०४६॥
अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, भन्यत्व, अशुचित्व, पानव और सुनय से संबर निर्जरा होती है । लोक बोधि की अति दुर्लभता, उत्कृष्ट धर्म, इस प्रकार बारह अनुप्रेक्षाएं हैं। उनका अपने-अपने भेदों से युक्त जो चिन्तबन करना है, वह संस्थान विचय ध्यान है। ...
अनित्य भावना उत्पत्तिः प्रलयश्च पर्ययवशाद् द्रव्यात्मना नित्यता, यस्तुमा निश्रये प्रतिक्षरण मिहाज्ञानाज्जनो मन्यते । . नित्यत्वं द्रवयंबुदोपकलिकास्थैर्य प्रथार्थी दिके, .. . नष्टे नष्टधृतिः करोति व्रत शोकार्ती याऽऽत्मीयफे ॥१०४७॥
इस लोक में वस्तुओं के समूह में प्रतिक्षण द्रव्याथिक नय की अपेक्षा नित्यता है, पर्याय की अपेक्षा उत्पत्ति और विनाश हैं। अज्ञान से जन नष्ट होने वाले पानी और दीपक की कलिका में स्थिरता नित्यत्व मानता हैं, जिससे अपने धनादि के नष्ट हो जाने पर नष्ट हो गया है धैर्य जिसका, ऐसा मानव व्यर्थ शोक और दुःख को प्राप्त करता है।
प्रशरण भावना मंत्रास्तंत्रततिस्तदन्धित कृतिढुंगा द्विषदुर्गमा, भृत्याः किं न भृताः सुहृत्ततिरपीत्येतेषु सत्सप्यमः ।।
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